रोटी दो जून की

कड़ी धूप में काम करती एक भारतीय मजदूर महिला, चेहरे पर थकान और उम्मीद, पीछे पढ़ते बच्चे, दो वक्त की रोटी के संघर्ष का भावुक दृश्य।

अर्पणा सिंह “अर्पी” , रांची

बड़ी मुश्किलों से मिल पाती है निजात,
मज़दूरों को पाने में रोटी दो जून की सौगात।

बैशाख की दोपहरी की धूप या बहती लू,
पसीने से लथपथ हो या हो तपती भू।
तन ढकने को वसन और मिटाने को भूख,
इसी की आपूर्ति में रहते हैं हर पल मशगूल।

बड़ी मुश्किलों से मिल पाती है निजात,
मज़दूरों को पाने में रोटी दो जून की सौगात।

पढ़-लिख कर बच्चे जग में नाम कमाएँ,
अभिशप्त गरीबी शब्द को जीवन से मिटाएँ।
इन्हीं उच्च विचारों के साथ गृह-त्याग देती,
ना साथ दे पति, उससे भी मुँह मोड़ लेती।

बड़ी मुश्किलों से हो पाती है निजात,
मज़दूरों को पाने में रोटी दो जून की सौगात।

भाग-भाग कर दूसरों का चौका-बर्तन करती,
होती नहीं हताश, उम्मीदों का दामन थामे रहती।
बच्चों के उज्ज्वल भविष्य बनाने को आगे बढ़ती,
मुश्किलों में भी मंज़िल हासिल करने को आतुर रहती।

बेशक गँवा देती है जीवन के सुनहरे पल,
जुटाने में रोटी दो जून की…

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