
नीरजा कृष्णा, पटना
द्यूत क्रीड़ा में उस पराजय और कुलवधु द्रौपदी के अपमान के पश्चात् सभी पांडव भीष्म पितामह के पास पहुँचे।
“हे वत्स, महाराज धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर द्वारा हारा हुआ सब कुछ तो लौटा दिया है। अब तुम लोग किस ऋण की बात कर रहे हो…?”
इतना सुनते ही अर्जुन उठ खड़े हुए और विरोध में बोले—
“पितामह! महाराज ने अपनी कुलवधु द्रौपदी का मान-सम्मान तो नहीं लौटाया। उन्होंने दुःशासन के हाथों को दंडित नहीं किया। उन्होंने उस जिह्वा को भी दंडित नहीं किया, जिसने भरी सभा में उसे वेश्या कहकर बुलाया था…”
तभी द्रौपदी आवेश में उठीं और हाथ जोड़कर विलाप करते हुए बोलीं—
“पार्थ! शांत हो जाइए। आप पाँचों भाइयों ने मुझे अपनी संपत्ति समझ रखा था। वैसे, जब धर्मराज स्वयं ही पराजित हो चुके थे, तब उन्हें अपनी पत्नी को दाँव पर लगाने का अधिकार कैसे मिला…? पहले मेरे प्रश्न का उत्तर दिया जाए।”
सभी के सिर शर्म से झुक गए। वे उसी आवेश में आगे बोलीं—
“और… और सभा में उपस्थित किसी ने भी इस अन्याय का विरोध नहीं किया।”
“मैं ज्येष्ठ भ्राता श्री के आदेश का विरोध कैसे करता?”
“हे पार्थ, अन्याय और अधर्म का विरोध करना बहुत बड़े पुण्य का कार्य है। ऐसा शास्त्रों में भी लिखा है। आज पितामह के समक्ष आप लोग अपने मिथ्या पुरुषार्थ का प्रदर्शन न करें…”
और सभी को हतप्रभ छोड़कर पाँचाली कक्ष से बाहर चली गईं।

बहुत ही बढ़िया
पांचाली ने सही कहा कि पांचो पांडवों ने अपनी संपत्ति उसको समझ रखा था तभी तो गांव पर लगाया पांचाली का उत्तर मेरे हिसाब से सही है
पांचाली ने सही बोला कि आप लोगों ने मुझे अपनी संपत्ति समझ रखा था पत्नी नहीं पत्नी को कोई दान पर नहीं लगता है पांचाली का उत्तर सही है मेरे हिसाब से
द्रौपदी ने सही कहा, बाद में पांडवों ने सभा में जो कुछ भी कहा वो पुरुषार्थ का ढोंग था, द्रौपदी को दांव पर लगाना ही नहीं चाहिए था।
पंचाली को दांव पर लगाना पांडवों का गलत निर्णय था।
Where is the purshart? Kisne unhein adhikaar Diya tha drupadi t ko dahon per lagane ka. Vah Koi vastu nahin thi. Sare mard us sabha ke napunsak the