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महाभारत की सभा में खड़ी द्रौपदी, पांडवों और भीष्म के सामने प्रश्न उठाती हुई

पुरुषार्थ

महाभारत के द्यूत क्रीड़ा प्रसंग के बाद का एक भावनात्मक और विचारोत्तेजक चित्रण है, जहाँ द्रौपदी पांडवों और भीष्म पितामह के सामने अपने अपमान और न्याय के प्रश्न उठाती हैं। यह रचना न केवल पौराणिक घटना को जीवंत करती है, बल्कि आज के समाज में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की आवश्यकता को भी उजागर करती है। जानिए सच्चे पुरुषार्थ का अर्थ क्या है।

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कर्म की सीख…

सफलता आस्था को और प्रबल कर देती है . पंडित जी ने दोनों के जन्मांक देखें और पहले लड़के से कहा – कि वह इस बार अवश्य अधिकारी बन जाएगा और दूसरे लड़के से कहा- तुम्हारे ग्रह नक्षत्र कमजोर हैं, इसलिए तुम्हें किसी अन्य व्यवसाय पर ध्यान देना चाहिए.
१० वर्ष की आस्था भविष्य के आकलन को समझ नहीं पाती, परंतु वह दादा से कहती है कि मेरे विद्यालय में यह बताया जाता है, कि परिश्रम से भाग्य बनता है .आप सभी को परिश्रम से विमुख क्यों कर रहे हो?

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