“स्त्री-मन की व्यथा और अस्तित्व की खोज: ‘अवनि से अंबर तक

सुप्रसन्ना जी के काव्य-संकलन में नारी-जीवन का मार्मिक चित्रण

समीक्षक-डॉ.शैफालिका वर्मा

साहित्य समाज का दर्पण है, और अब साहित्य संस्कार का दर्पण हो गया है। समाज रहा कहाँ? जहाँ एकात्मकता होती थी, एक-दूसरे के साथ मिलकर दुःख-सुख बाँटे जाते थे. वही समाज होता था। मगर अब? अब सभी सिर्फ अपने लिए हैं। समाज टूट रहा है, परिवार बिखर रहा है; पर औरत का दर्द, मन की व्यथा. मन में ही रह गई है।
यूँ लगता है जैसे समाज की सारी बुराइयों की जड़ वही स्वयं हो। यह आत्मग्लानि का भाव एक ओर उसमें वेदना के बीज बो रहा है, तो दूसरी ओर अपने अस्तित्व का भी बोध करा रहा है.“हम भी कुछ हैं, यह ध्यान रहे। ”सुप्रसन्ना जी का पद्य-संकलन ‘अवनि से अंबर तक’ जीवन की मेघमालाओं के मध्य, मन के इन्द्रधनुषी रंगों में आलोकित हो रहा है, किन्तु, कभी-कभी जब स्त्री ही स्त्री की दुश्मन बन उसे भला-बुरा कहने लगती है, तो स्थिति विकट हो जाती है। इन्हीं भावनाओं और वेदनाओं को लेकर सुप्रसन्ना जी की कविताएँ ज़िंदगी के गीत गाती हैं. कभी हँसती-मुस्कुराती, तो कभी वेदना में डूब जाती हैं। इनकी कविताओं में बसंत है, तो पतझड़ भी; कभी-कभी तो दोनों साथ चलते हैं.

लेखिका सुप्रसन्ना झा

उन्होंने ज़िंदगी में बहुत कुछ पाया
कभी प्यार, तो कभी तकरार;
कभी खुशी, कभी उदासी
जैसा कि इनकी कविताओं से प्रतीत होता है।

वैसे भी नारियों के लिए कहा गया है.
“अबला जीवन, हाय! तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”

वास्तव में, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। नारी का जीवन आज भी बड़े प्रतिशत में इसी स्थिति में है। एक ओर नारियाँ आकाश की ऊँचाइयों को छू रही हैं, दूसरी ओर उनकी आँखों में आँसू लबालब हैं; आँचल का दूध मातृत्व लिए. आज भी है। आज भी नारी प्रताड़ित हो रही है. चाहे कारण दहेज हो या पुरुषत्व का अहंकार।

“हाँ, वह माँ थी,
उसे पाषाण बनना था;
कमज़ोर इंसानों की तरह उसे रोना नहीं था।”

इन पंक्तियों में नारी की सहनशीलता की चरम सीमा व्यक्त हुई है। वास्तव में नारियाँ धरती होती हैं. कितने भी पैरों से रौंदो, फिर भी फल-फूल ही उगाती हैं, हरियाली ही जीवन में भरती हैं।

“विश्वास के रंग का स्थायित्व सतत रहता है,
वह मौसम के रंग की तरह कभी नहीं बदलता;
जो बदलते रंगों के बीच कभी नहीं ठहरता
हाँ, विश्वास का रंग।”

कवयित्री की पीड़ा भरी ये पंक्तियाँ जैसे हृदय को चीर जाती हैं

“सच कहूँ,
स्त्री होना सहज न था
आदिकाल से ही,
गलत न होने पर भी
अहिल्या का पत्थर बन जाना,
वृन्दा का तुलसी बन जाना,
सीता का कलंकित जीवन बिताना—
ना-ना, स्त्री होना सहज न था।”

इन पंक्तियों को पढ़कर तन-मन एक अव्यक्त मूर्छना में भर जाता है. स्त्री की व्यथा विगलित हो उठती है

“क्या मृत्यु तुम प्रत्यक्ष खड़ी थी,
पाषाण-सी मैं निहारूँ…”

दर्द का समंदर. स्त्री का जीवन। एक सशक्त तरुवर से लता की तरह लिपटी रहती है स्त्री; किन्तु जब सहारा देने वाला तरुवर ही अचानक गिर जाए, तो छिन्न-भिन्न लता धरती पर बिखर जाती है।

किन्तु, यशोधरा के शब्दों में
“अब कठोर हो वज्रादपि, कुसुमादपि हे सुकुमारी,
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है तेरी बारी।”

और कवयित्री सुप्रसन्ना लेखनी हाथ में लेकर मातृत्व की गरिमा को अजर-अमर कर जाती हैं।

वैसे भी स्त्री-लेखन में स्त्रियों को जीवन में बहुत-सी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें केवल अपने मन की एक दुनिया मिलती है, जहाँ वे अपने सपनों के घरौंदे बनाती हैं और उसी में जीती हैं। एक अंतर्द्वंद्व निरंतर उनके हृदय में चलता रहता है। अपनी अस्मिता की तलाश में वे बेचैन रहती हैं और यही बेचैनी कविता का सृजन कर जाती है। जिस प्रकार माँ प्रसव-वेदना से छटपटाती है और बच्चे के जन्म के बाद चैन की साँस लेती है, ठीक वैसी ही स्थिति कविता के जन्म से पहले कवि की होती है। अपने मानस-शिशु के जन्म के उपरांत ही वह निष्कृति की साँस लेता है।

भी तो कोरोना को भी कवयित्री ने नहीं छोड़ा

“कोरोना है डरावना
पल-पल मौत की खबर;
नहीं, नहीं, नहीं होगी
मुझसे अब आराधना।”

शब्द ब्रह्म है—अतः कवयित्री ने बोलने-लिखने में शब्दों के प्रयोग का भी अत्यंत रमणीय वर्णन किया है। कुल मिलाकर जीवन के साथ मन की तरंगें हर रूप में ‘अवनि से अंबर तक’ विशद, विरल भावनाओं से सजी हैं।

आज किसी भी भाषा में महिला-लेखन की बाढ़-सी आ गई है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे गार्गी, मैत्रेयी, भारती आदि का युग फिर से लौट रहा हो। परंतु किसी भी साहित्य के इतिहास में महिला साहित्यकारों को शायद ही यथोचित स्थान मिला हो, विशेषकर आधुनिक काल में। किंतु यह निश्चित है कि समय सबकी पहचान कराता है।

Virginia Woolf ने बहुत ही सुंदर बात कही है
“If you do not tell the truth about yourself, you cannot tell it about other people.”

वास्तव में, लेखन सच्चाई चाहता है। कृतित्व और व्यक्तित्व की एकरूपता ही किसी भी हृदय को स्पर्श कर पाने की क्षमता रखती है। आशा ही नहीं, वरन् पूर्ण विश्वास है कि सुप्रसन्ना जी की इस कृति का स्वागत सुधी पाठकों के साथ प्रज्ञावान आलोचक भी करेंगे और चमत्कृत होंगे।

One thought on ““स्त्री-मन की व्यथा और अस्तित्व की खोज: ‘अवनि से अंबर तक

  1. अवनि से अम्बर तक पुस्तक लेखन की बहोत बहोत बधाई। 💐💐

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