“स्त्री-मन की व्यथा और अस्तित्व की खोज: ‘अवनि से अंबर तक

साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, पर आज यह स्त्री-मन की गहराइयों का भी प्रतिबिंब बन चुका है। ‘अवनि से अंबर तक’ में सुप्रसन्ना जी ने नारी के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मातृत्व और आत्मबोध को अत्यंत संवेदनशीलता से उकेरा है। उनकी कविताएँ कभी मुस्कान बनकर खिलती हैं, तो कभी वेदना बनकर हृदय को भिगो देती हैं। यह काव्य-संकलन न केवल स्त्री-अस्तित्व की खोज है, बल्कि समाज की बदलती संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज भी है।

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कासे कहूं

घरेलू हिंसा की मार झेलती मालती अपने दर्द को सहजता से बयान कर देती है, जबकि उसकी मालकिन मिसेज सुजैन अपने ही जख्म छुपाए बैठी हैं। कहानी निम्न वर्ग और उच्च वर्ग के बीच पनपती एक समान पीड़ा को उजागर करती है. जहां मार खाने की आदत समाज के नजरिए से तय होती है, लेकिन दर्द हर औरत का एक-सा होता है।

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