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‘सुप्रसन्ना’ अवनि से अम्बर तक

वनगाँव की मिट्टी और मिथिला की सांस्कृतिक चेतना से लेकर जोधपुर की साहित्यिक दुनिया तक सुप्रसन्ना की यात्रा संस्कार, संवेदना और सृजन की कहानी है. हिन्दी और मैथिली में लेखन करने वाली सुप्रसन्ना से साहित्य, कविता, स्त्री-मन, लोकसंस्कृति और रचनात्मकता पर आत्मीय बातचीत.

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“स्त्री-मन की व्यथा और अस्तित्व की खोज: ‘अवनि से अंबर तक

साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, पर आज यह स्त्री-मन की गहराइयों का भी प्रतिबिंब बन चुका है। ‘अवनि से अंबर तक’ में सुप्रसन्ना जी ने नारी के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मातृत्व और आत्मबोध को अत्यंत संवेदनशीलता से उकेरा है। उनकी कविताएँ कभी मुस्कान बनकर खिलती हैं, तो कभी वेदना बनकर हृदय को भिगो देती हैं। यह काव्य-संकलन न केवल स्त्री-अस्तित्व की खोज है, बल्कि समाज की बदलती संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज भी है।

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