कृष्ण और कृष्ण प्रिया

अंशु गुप्ता, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

चंचला का देव मैं,
मैं ही वामन का तीन पग,
मैं ही हूँ अतुल्य नग,
मैं ही निकुंज में विहार करता हूँ,
नरका, बका और अघा का संहार करता हूँ।

परशुधारी परशुराम हूँ,
रासबिहारी मैं ही घनश्याम हूँ,
उग्र में नरसिंह मैं,
रुद्र में महाकाल हूँ।

लीला ऐसी रास करूँ,
मैं ही मदनमोहन माधव हूँ,
समुद्र मंथन में कच्छप अवतार,
मैं ही मत्स्य नारायण हूँ।

त्रिनेत्रधारी, चक्रधारी, मैं ही गोपदेव,
मैं ही एक, मैं ही श्रेष्ठ,
वासुदेव पुत्र,
मैं ही नंदलाल हूँ।

एक लाली कहे “कृष्ण प्रिया”,
दासी अपना नाम धरे,
ग्वालन वस्त्र, अश्रु-मुस्कान लिए,
छन-छन उसकी पायल करे।

ना जाने कोई नियम, मुख से “प्रियतम” कहे,
लगाए हरदम गुहार,
केशों से बिखरी कहे मुझे सवार दो।

भक्ति में यदि ज्यादा वजन हो,
तो मुझे यह भार दो,
कृष्ण नाम का इत्र जो छिड़का,
कृष्ण सी मैं महक उठूँ।

कृष्ण नाम का तिलक नहीं,
सिंदूर जो मैं उसे लगा लूँ,
माथे पर मेरे वृंदा का पात सजे,
अल्ता का रंग लगा लूँ।

स्याही मेरे हाथ में, ऐसी सेवा मैं करूँ,
सारी बातें बोलकर कहे
कि तुम भरो हामी,
जब मैं कहूँ “आओ न स्वामी…”

लेखिका के बारे में


अंशु गुप्ता
समकालीन हिंदी काव्य जगत की एक सशक्त और संवेदनशील स्वर हैं, जिनकी रचनाओं में भाव, भक्ति और सामाजिक चेतना का सुंदर संगम दिखाई देता है। प्रहरी मंच, महिला काव्य मंच और चैतन्य काव्य मंच से सक्रिय रूप से जुड़ी अंशु गुप्ता वर्तमान में दर्जिलिंग इकाई में सचिव के रूप में अपनी साहित्यिक भूमिका निभा रही हैं।उनकी कविताएँ प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘दैनिक विश्वमित्र’ में नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं तथा लिट्ररी सोसाइटी की ‘पोलिग्लोट’ पत्रिका में भी उनकी रचनाएँ सराही गई हैं।
पश्चिमबंग हिंदी अकादमी, खबर समय द्वारा ‘कलमकार 2024’, मोहन लाल जैन सम्मान, विद्यापति मंच और सिलीगुड़ी लिटररी सोसाइटी जैसे विभिन्न मंचों से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. सत्या होप टॉक के मंच पर उनका काव्य पाठ प्रसारित हो चुका है और वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी कविताओं की प्रस्तुति दे चुकी हैं। स्त्री विमर्श, भक्ति और पौराणिक कथाओं को केंद्र में रखकर लिखी गई उनकी रचनाएँ पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ती हैं। काव्य लेखन के साथ-साथ अध्ययन, नृत्य, चित्रकला और मंच संचालन में उनकी गहरी रुचि है, जो उनकी रचनात्मकता को और अधिक समृद्ध बनाती है।

इन रचनाओं को भी पढ़ें और टिप्पणी दें

मेरी प्यारी काली माँ
अंतर्मन की वेदना
“हाय… क्या हो रहा है…
करुणा सागर
बढ़ती महंगाई

One thought on “कृष्ण और कृष्ण प्रिया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *