अधूरा आशियाना

रात के आकाश के नीचे अकेला बैठा व्यक्ति, सितारों की ओर देखते हुए, चेहरे पर उदासी और जुदाई का भाव

अर्पणा सिंह अर्पी, रांची

हम रंज़िशे हालात बतायें भी तो कैसे ,
वो रूठ के बैठे हैं मनायें भी तो कैसे।

बैठे हैं बना कर के ये छोटा सा आशियाँ,
उनके बगैर इसको सजायें भी तो कैसे।

हमने किया है जान औ दिल उनके हवाले,
हम अपनी मुहब्बत को भुलायें भी तो कैसे।

जाने कहाँ छुपे हैं सितारों की ओट में,
आशियानाँ दीवारों को बनायें भी तो कैसे।

है कोई जहां में जो पता उनका बता दें,
अन्जान शह्र उनको यूँ पायें भी तो कैसे।

हूँ कश्मकश में कैसे हो दीदारे मुहब्बत ,
ये दिल का मामला है दबायें भी तो कैसे।|

लेखिका के बारे में-

अर्पणा सिंह
एक सशक्त और बहुआयामी रचनाकार हैं, जिनकी लेखनी संवेदना, समाज और सरोकारों का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है।
राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने शिक्षिका के रूप में अपने ज्ञान और मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया।लेखन के क्षेत्र में उनकी पहचान एक सशक्त कवयित्री और संवेदनशील कथाकार के रूप में बनी है। नवीन कदम छत्तीसगढ़ की काव्य प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रभावशाली परिचय दिया। माँ शारदे मंच द्वारा ‘लोक संस्कृति साधक सम्मान’ से सम्मानित होना उनकी सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है। ‘शब्द सिंधु’ द्वारा सर्वश्रेष्ठ रचनाकार और WOW द्वारा ‘शानदार शायर’ का ख़िताब उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा को और सुदृढ़ करता है।उनकी रचनाएँ प्रभात खबर, दैनिक जागरण, शुभम संदेश और आई नेक्स्ट जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।साहित्योदय के अंतर्गत उन्हें लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स सर्टिफिकेट भी प्राप्त हुआ है, जो उनकी रचनात्मक उपलब्धियों का वैश्विक सम्मान है।‘काव्यांजली’, ‘दहलीज़ से आगे’, ‘मनस्वी’ और ‘कृष्णायण अखण्ड काव्यार्चन’ जैसे संकलनों में उनकी रचनाएँ पाठकों को गहराई से प्रभावित करती हैं। अर्पणा सिंह आज भी अपनी लेखनी के माध्यम से समाज, संस्कृति और मानवीय भावनाओं को सशक्त स्वर दे रही हैं।

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