
माधवी उपाध्याय, जमशेदपुर (झारखंड)
हो गया है क्या…!
कौन सुनता है किसी को आजकल,
अपनी कहनी है सभी को आजकल।।
सिर्फ़ अपनी वाह- वाही चाहिए
क्या हुआ है आदमी को आजकल।।
पास रहकर भी मिले सदियाँ हुईं,
कौन देखे मन दुखी को आजकल।।
मौसमों की बेरहम -सी आंधियाँ,
ले गई उलझा सभी को आजकल।।
रात दिन ग़म से घिरे माहौल में
ढूंढते हैं हम खुशी को आजकल
पीर अब शीतल नहीं है कर रही,
हो गया क्या कौमुदी को आजकल।।
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