उड़ेगी एक दिन वो…

“बालकनी में खड़ी स्वतंत्रता तलाशती महिला” “बालकनी में खड़ी स्वतंत्रता तलाशती महिला”

सुरेश परिहार (संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे)

वह उड़ना चाहती थी
एक आज़ाद परिंदे की तरह।

आसमान उसके हिस्से में था,
पर उसे एक पिंजरे में रख दिया गया।

उसके पर
धीरे-धीरे काटे गए
जैसे किसी ने उड़ान से डरकर
हवा ही कम कर दी हो।

बहुत फड़फड़ाई वह,
पिंजरे की सलाखों से टकराकर
आवाज़ भी लौटी नहीं वापस।

फिर एक दिन
उसे खोल दिया गया
किसी और की ख्वाहिश के लिए।

अब वह उड़ती है…
थोड़ा-थोड़ा।

कभी पंखे पर बैठ जाती है,
कभी दरवाज़े की चौखट पर
कभी सातवीं मंज़िल की बालकनी से
नीचे झांकती है

जहाँ गाड़ियाँ खिलौनों-सी दौड़ती हैं,
लोग बिंदु-से लगते हैं,
और पेड़… जैसे किसी ने
ज़मीन पर हरियाली उकेरी हो।

वह अभी सीख रही है
उड़ना…

एक दिन
वह सच में उड़ जाएगी
आसमान को छूने नहीं,
उसे अपना बनाने।
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13 thoughts on “उड़ेगी एक दिन वो…

  1. बेहतरीन भविष्य की कल्पना…. जो शायद सच हो जाये

      1. बहुत सुन्दर रचना,भविष्य की योजनाओं के सत्य होने की पहली सीढ़ी, है कल्पना, रचनाकार को साधुवाद इस उत्कृष्ट रचना हेतु।

    1. बहुत सुन्दर रचना, भविष्य की उड़ान के पँख समान रचना, रचनाकार को साधुवाद इतनी सुन्दर रचना के लिए।

  2. पंख भी है खुला आसमान भी फिर ना उड़ पाने की मजबूरी कैसी ….लगता है आत्मा पर संस्कारों की कील ठोक दी गई है कि पंख बस यूं ही फड़फड़ाए…..

  3. ख्वाइश आसान है पर उनका पूरा करना बहुतकठिन,,,,, शानदार अभिव्यक्ति

  4. ‘उड़ेगी एक दिन वो’ ये कविता हर सूनी आंखों की कविता है जिसमें कई मासूम से सपने पलते हैं कुछ सपनों को उड़ान मिलती है और कुछ सपनों की डोर उड़ान के पहले ही काट दी जाती है पर उन सूनी आंखों की उम्मीद कभी नहीं मरती कि कभी न कभी तो उसके हिस्से का आसमान मिलेगा जहां वो अपनी उन्मुक्त उड़ान भर सकेगी। सुरेश परिहार सर की बहुत ही सारगर्भित रचना।अशेष शुभकामनाएं सर

    1. आपने अपना कीमती समय निकाल कर रचना पढ़ी और उस पर टिप्पणी की उसके लिए दिल से धन्यवाद..आप इसी तरह मार्गदर्शन करती रहें

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