“बालकनी में खड़ी स्वतंत्रता तलाशती महिला”

उड़ेगी एक दिन वो…

यह कविता एक स्त्री की कहानी है, जिसे परिंदे के रूपक में प्रस्तुत किया गया है। यह केवल उड़ान की बात नहीं, बल्कि उस मानसिक और सामाजिक कैद की कहानी है, जिसमें अक्सर महिलाओं को सीमित कर दिया जाता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। धीरे-धीरे वह फिर से अपने अस्तित्व को पहचानती है, छोटे-छोटे कदमों से खुद को संभालती है और उड़ना सीखती है। यह यात्रा आसान नहीं है यह डर, झिझक और आत्मसंघर्ष से भरी है लेकिन हर कोशिश उसे उसके असली आसमान के करीब ले जाती है।

Read More

ना रोक खुद को अब…

हर कठिनाई से लड़ने की ताकत रखती है तू, तो फिर सुन स्त्री, अब अपने स्त्री होने पर शर्म नहीं, गर्व किया कर। जहाँ मन लगे, वहाँ दिल लगाना तेरा अधिकार है, और आईने में मुस्कुराकर खुद को पहचानना भी। तू सिर्फ जिम्मेदारियों में नहीं, हक़ में भी जी सकती है – खुद से प्यार कर, खुद को सजा, और दुनिया को दिखा कि तू क्या है।”

Read More