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नारी शक्ति का प्रतीक भारतीय महिला, जिसमें दुर्गा, मीरा और रानी लक्ष्मीबाई के रूपों की झलक दिखाई दे रही है

स्त्री की वाणी

वह केवल एक स्त्री नहीं, बल्कि अनगिनत रूपों का संगम है दर्द को आँखों में समेटे हुए भी अडिग खड़ी। वह चौखट की मर्यादा भी है और जीवन की हर जिम्मेदारी का आधार भी। कभी दुर्गा बनकर शक्ति का प्रतीक बनती है, तो कभी मीरा बनकर भक्ति में विलीन हो जाती है। उसके भीतर द्रौपदी की प्रतिज्ञा है, पद्मिनी का त्याग है और झांसी की रानी सा साहस भी। वह मौन रहकर भी बहुत कुछ कहती है, सहनशीलता में भी आग समेटे रहती है। वही मां है, वही बेटी और उसी से इस संसार की हर कहानी, हर रिश्ते और हर अस्तित्व की शुरुआत होती है।

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“बालकनी में खड़ी स्वतंत्रता तलाशती महिला”

उड़ेगी एक दिन वो…

यह कविता एक स्त्री की कहानी है, जिसे परिंदे के रूपक में प्रस्तुत किया गया है। यह केवल उड़ान की बात नहीं, बल्कि उस मानसिक और सामाजिक कैद की कहानी है, जिसमें अक्सर महिलाओं को सीमित कर दिया जाता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। धीरे-धीरे वह फिर से अपने अस्तित्व को पहचानती है, छोटे-छोटे कदमों से खुद को संभालती है और उड़ना सीखती है। यह यात्रा आसान नहीं है यह डर, झिझक और आत्मसंघर्ष से भरी है लेकिन हर कोशिश उसे उसके असली आसमान के करीब ले जाती है।

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ना रोक खुद को अब…

हर कठिनाई से लड़ने की ताकत रखती है तू, तो फिर सुन स्त्री, अब अपने स्त्री होने पर शर्म नहीं, गर्व किया कर। जहाँ मन लगे, वहाँ दिल लगाना तेरा अधिकार है, और आईने में मुस्कुराकर खुद को पहचानना भी। तू सिर्फ जिम्मेदारियों में नहीं, हक़ में भी जी सकती है – खुद से प्यार कर, खुद को सजा, और दुनिया को दिखा कि तू क्या है।”

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