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दिलों को जोड़ती, नफरतों को तोड़ती हिंदी

बाबूलाल डीलवाल ‘वरिष्ठ अध्यापक,गांव जावली,पोस्ट रेन, तहसील मेड़ता सिटी

निर्बाध गति से आगे बढ़ती,
दिलों को जोड़ती हिंदी।

अपनी गति से आगे बढ़ती,
हिंदुस्तान का हृदय हिंदी।

संस्कृतियों को जोड़ती,
वर्जनाओं को तोड़ती हिंदी।

सुहृदयजनों के भावों को
अपनी ओर मोड़ती हिंदी।

परंपराओं को तोड़ती,
नई परंपराएं जोड़ती हिंदी।

राम-रहीम से आगे बढ़,
बंटी-बबली को जोड़ती हिंदी।

अनेक भाषाओं के दरिया को
अपनी ओर मोड़ती हिंदी।

पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से
दिलों को जोड़ती हिंदी।

प्रेम, इंसानियत को जोड़ती,
नफरतों को तोड़ती हिंदी।

राम को रहीम और
कृष्ण को करीम से जोड़ती हिंदी।

7 thoughts on “दिलों को जोड़ती, नफरतों को तोड़ती हिंदी”

  1. दिलों को जोड़ती हिन्दी से आप ने क्या खूब लिखा है।
    हिंदुस्तान में हिन्दी का असर दिलों को जोड़ते दिखा है।।

    1. धन्यवाद
      नरेश भाई
      मेरी पहली रचना है जो सार्वजनिक मंच पर आई है.

      1. ये मंच ही शुरु ऐसे ही लोगों के लिए किया गया है. आप लिखते रहें इसी तरह. नवोदित रचनाकारों का स्वागत है

          1. देश में भाषाओं के मतभेद में आप के विचार से सकारात्मक संदेश जाता है। ऐसे ही नवाचार करते रहे ।

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