क्या-क्या है हिंदी

कविता हिंदी भाषा की विविधता, सांस्कृतिक महत्व और इसकी भावनात्मक गहराई को उजागर करती है। यह बताती है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, बल्कि यह संबंधों, संस्कारों, व्यक्तित्व, वीरता, साधना और भक्ति का प्रतीक है। मां की गोद से लेकर ऋषि-मुनियों की सभ्यता, संत-कवियों की शिक्षा और समाज के विविध अनुभव—हिंदी इन सबका माध्यम रही है। कविता में यह भी कहा गया है कि हिंदी ने विश्व मंच पर भी अपनी पहचान बनाई है और विभिन्न परिस्थितियों में लोगों के मनोभावों, संस्कारों और इतिहास को व्यक्त किया है।

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दिलों को जोड़ती, नफरतों को तोड़ती हिंदी

हिंदी अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ती है और लोगों के दिलों को जोड़ती है। यह हिंदुस्तान का हृदय बनकर अपनी सरल और सहज चाल से सबको साथ लेती है। हिंदी संस्कृतियों के बीच पुल बनाती है और वर्जनाओं को तोड़ती है। यह सुहृदयजनों के भावों को अपनी ओर मोड़ती है और परंपराओं को तोड़कर नई परंपराएं बनाती है। हिंदी राम-रहीम और कृष्ण-करीम जैसी एकता को सामने लाती है, बंटी-बबली जैसी कहानियों को अपनाती है और अनेक भाषाओं के दरिया को अपनी ओर मोड़ती है। यह पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से दिलों को जोड़ती है, प्रेम और इंसानियत को बढ़ाती है और नफरतों को दूर करती है।

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मैं और मेरी हिंदी

जब से मैंने हिंदी लेखन शुरू किया है, कई हिंदी के धुरंधरों की तीखी नज़रों से नज़र बचाते हुए घूम रहा हूँ। उन्हें ऐसा लगने लगा है कि मैंने उनका एकाधिकार छीन लिया है। मैं, जो अंग्रेज़ी दवा का डॉक्टर होकर सारी ज़िंदगी फिरंगी भाषा की चाकरी में लगा रहा, अब अचानक हिंदी भाषा में लिखने का क्या चस्का लग गया?
फेसबुक पर मेरे एक पुरातात्विक-कालीन हिंदी के गुरुजी जुड़े हुए हैं, जो मेरे हर एक लेख को बारीकी से देखते हैं। मुझे लगता है कि मेग्निफाइंग ग्लास का प्रयोग करते होंगे। ऐसा नहीं लगता कि मोबाइल में फॉण्ट को उँगलियों से ज़ूम करना भी उन्हें आता होगा! हमें ऐसा लगता है जैसे हम वापस स्कूल में आ गए हैं।

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हिन्दी दिवस बीत जाए

हिंदी स्वयं को एक दिन की रानी और भाषाओं की नानी कहती है। उसकी बहन उर्दू है, जिसके साथ उसे सदा बने रहना है। हिंदी चाहती है कि वह फूले-फले और खूब आगे बढ़े। वह आग्रह करती है कि लोग उसे सिर्फ उसके दिवस पर ही नहीं, बल्कि हर दिन याद करें, पढ़ें और लिखें।

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आन है हिंदी

हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि देश का सम्मान और अभिमान है। इसमें प्रेम बसता है, स्वरों की मधुर तान गूंजती है और हर शब्द अपनी सरस लय से हृदय को छू लेता है। यह हमारी सभ्यता और सरल आचरण की पहचान है, जो चरित्र को निखारती और राष्ट्र की शान को बढ़ाती है। हिंदी के बिना ज्ञान अधूरा है, इसलिए इसे सदा सर्वोपरि रखना ही हमारा कर्तव्य है।

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भाषा

कविताएँ हर भाषा को अपने भीतर जगह देती हैं। वे जानती हैं कि भाषा कोई बंधन नहीं, बल्कि संस्कृति और चेतना के बीज हैं। चरवाहे का गीत, मछुआरों की धुन और मजदूर का प्रतिरोध—सबकी आवाज़ कविताएँ सीमाओं से परे ले जाना चाहती हैं। भाषाओं का मेल ही विचारों को स्थायी बनाएगा और मानवता को जीवित रखेगा।

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दोगले दिखावे में डूबी सभ्यता

इस व्यंग्यात्मक कविता में आधुनिक सभ्यता पर तीखा प्रहार किया गया है, जहाँ दिखावे की चकाचौंध में इंसान की असली पहचान खोती जा रही है। हर वर्ग, हर उम्र इस बनावटी संस्कृति की चपेट में है — चाहे वह भाषा हो, पहनावा हो, या जीवनशैली। ‘दाढ़ी पेट में है’ जैसे प्रतीकों के ज़रिए लेखक ने दिखावे की भूख को उजागर किया है, वहीं ‘चंगू जी बिक गए’ जैसे कटाक्षों से सामाजिक मूल्यों के पतन की ओर इशारा किया गया है। यह अंश समाज की दोहरी मानसिकता, भाषा के घमंड और आत्मकेंद्रित प्रवृत्तियों की एक झलक पेश करता है — जहाँ आंतरिक मूल्य गौण हो गए हैं और बाहरी प्रदर्शन ही सब कुछ बन गया है।

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