प्यासी पलकें
प्यासी पलकें प्रेम और विरह की उस बेचैनी को बयां करती हैं, जहाँ यादें हर पल साथ रहती हैं, मगर प्रेम की प्यास फिर भी अधूरी रह जाती है।

प्यासी पलकें प्रेम और विरह की उस बेचैनी को बयां करती हैं, जहाँ यादें हर पल साथ रहती हैं, मगर प्रेम की प्यास फिर भी अधूरी रह जाती है।
कुछ मोहब्बतें फूलों की तरह होती हैं. मुरझा जाती हैं, मगर उनके भीतर एक बीज बचा रहता है. वक्त और इंतज़ार के बाद वही प्रेम फिर किसी सुबह खिल उठता है.
अगर मृत्यु के बाद इंसान अपने जीवन का हिसाब खुद देख सके, तो उसके पास क्या बचेगा—धन, दौलत, रिश्ते या केवल कर्म? “मुर्दों की हुई सभा” इसी सवाल के माध्यम से जीवन का गहरा सच सामने रखती है।
गिरकर, टूटकर और बिखरकर भी जो फिर खड़ी हो जाए, वही असली कहानी है। “मैं एक कहानी हूँ” आत्मसम्मान, संघर्ष, हौसले और अपनी पहचान खुद बनाने की जिद को शब्द देती एक प्रेरणादायक कविता है।
उम्र के साथ बदलती जिंदगी, ढलती जवानी, कमजोर पड़ती ताकत और वक्त के बदलते रंगों की सच्चाई को बयां करती यह भावपूर्ण कविता इंसान को अपने आज पर घमंड न करने और दूसरों को खुश रखने का संदेश देती है.
जब भीतर का रोष शब्दों में उबलने लगे और कलम ही अभिव्यक्ति का आखिरी हथियार रह जाए, तब कविता जन्म लेती है. ‘एक दिन यूं ही’ इसी बेचैनी और आक्रोश की मार्मिक अभिव्यक्ति है.
माटी से माटी के नाते पर सवाल उठाता मन, पथराई आँखों में छिपी पीड़ा और भीतर सुलगते अहसासों को यह कविता संवेदनशील शब्दों में व्यक्त करती है.
“कौन हो तुम?” एक ऐसी भावपूर्ण कविता है, जिसमें प्रेम, विरह, प्रतीक्षा और आत्मिक जुड़ाव की अनुभूतियाँ शब्दों के माध्यम से जीवंत हो उठती हैं।
मनुष्य रूप में प्रभु श्रीराम का अवतार मर्यादा, त्याग और संघर्ष का अद्भुत संदेश देता है। प्रस्तुत कविता उसी दिव्य स्वरूप को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है।
प्रेम जब विश्वास मांगता है और रिश्ते परीक्षा लेने लगते हैं, तब सिया के मन में राम से कई अनकहे सवाल जन्म लेते हैं। यह कविता उसी प्रेम, पीड़ा, विरह और स्त्री के आत्मसम्मान की मार्मिक अभिव्यक्ति है।