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दिल पिघल गया

नन्ही रवनीत ने अपने अतिरिक्त जूते सहपाठी खुशी को देकर यह सिखा दिया कि संस्कार केवल शब्द नहीं होते, वे संवेदना बनकर जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान भी बनते हैं।

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क्या बुज़ुर्ग सच में अकेले पड़ रहे हैं?

84 साल की उम्र में 16वीं मंज़िल से छलांग लगाकर आत्महत्या इस घटना ने मुझे भीतर तक हिला दिया। उम्रभर की लड़ाइयाँ जीतने वाला इंसान अंतिम पड़ाव पर इतना टूट जाता है कि जीवन ही बोझ बन जाए, यह हमारे समाज और मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

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अमन की जोत फिर जलाना है

यह जीवन बस एक बहाना है — सांसों का आना-जाना, रिश्तों का मतलब और फर्ज़ निभाने की रस्में। अमीरों की थालियाँ भरी हैं, मगर गरीब का निवाला उनसे छिन गया है। मुफ़लिसी की बातें अब किससे कही जाएं, जब ज़माना इतना बेरहम हो गया है।

आईने अब चेहरों को नहीं, दिलों को पढ़ने लगे हैं — नया चेहरा, मगर दिल वही पुराना। विज्ञान के इस दौर में इंसान चाँद पर घर बसाने की सोच रहा है, जबकि ज़मीन पर जंगल सूने और परिंदे बेघर हो गए हैं।

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पापा, मुझे विदा कर दो…

कविता में एक अनजानी और अबोध आत्मा की पुकार है, जो जन्म लेने से पहले ही अपने जीवन की चुनौतियों और समाज में बढ़ती खतरे की भविष्यवाणी करती है। यह भावनात्मक रचना बताती है कि कैसे एक बच्चा, अपनी मासूमियत में, पहले से ही सुरक्षा और संरक्षण की लालसा रखता है, और कैसे वह अपनी सुरक्षा के लिए माता-पिता से प्रार्थना करता है कि उसे जन्म से पहले ही सुरक्षित स्थान पर रखा जाए। यह कविता सामाजिक चेतना और संवेदनशीलता को उजागर करती है।

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“रिश्तों की श्वास: विश्वास”

जिस प्रकार जीवन के लिए श्वास लेना आवश्यक है, उसी प्रकार रिश्तों को जीवित रखने के लिए विश्वास की आवश्यकता होती है। यदि रिश्तों में शक, झूठ और अवसाद जैसी अशुद्ध वायु भर जाए, तो उनका दम घुटने लगता है। ऐसे में जरूरी है कि हम स्वयं सकारात्मक रहें और अपने रिश्तों को विश्वास की स्वच्छ हवा प्रदान करें, क्योंकि इन्हें बचाने की ज़िम्मेदारी हमारी ही है – किसी और की नहीं।

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