नन्हीं डलिया में बताशे

यह कविता बीते दौर की उस मासूमियत और सामाजिक गर्मजोशी को याद करती है, जो अब आधुनिक जीवन की भागदौड़ में खो गई है। कभी गलियों में बच्चों की डुगडुगी, उपवनों में शर्माती कलियाँ, और दोस्तों का एक पुकार पर दौड़ आना — ये सब अब दुर्लभ हो गए हैं। कवि ने भावपूर्ण शब्दों में यह अहसास जताया है कि समय के साथ रिश्तों, संवेदनाओं और सादगी की वो चमक अब धुंधला चुकी है।

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रामलीला में एक अप्रत्याशित हादसा

यह घटना 1987 की है, जब मैं पीलीभीत के बीसलपुर में उपजिलाधिकारी था। दशहरे मेले में रावण के दरबार में स्थानीय नर्तकियाँ—पतुरिया—नृत्य करती थीं। उस वर्ष पुलिस उपाधीक्षक ने इस नृत्य पर रोक लगा दी। दशहरे के दिन, रावण बने कलाकार ने मुझसे पानी मांगा जिसे मैंने तुरंत दिया। लेकिन कुछ ही देर बाद वही कलाकार अचेत हो गया और चिकित्सालय पहुँचने पर मृत घोषित कर दिया गया। रावण वध उस वर्ष नहीं हो सका और मेला एक त्रासदी में समाप्त हुआ।यह एक याद दिलाती घटना है कि रावण का वध चाहे पुतले से हो या रामलीला में निभाए गए किरदार से, मृत्यु अपरिहार्य होती है।

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खुशबू से बंधा पहला प्यार

यह कविता मानो खुशबुओं का एक जीवन वृत्तांत है। हर स्मृति, हर अनुभव एक विशेष सुगंध से जुड़कर अमर हो गया है। पहली बारिश की मिट्टी की महक, प्रियतम की मीठी बातों की महक, किताबों से उठती खुशबू, हाथों में महंदी की गंध, गहनों में समाया पसीना, खिड़की से आती रातरानी की महक और तन पर चंदन की सुगंध—सब कुछ उसके प्रेम और साथ के अनुभवों से गुँथा हुआ है। यह केवल प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उन अदृश्य अनुभूतियों का बयान है जो इंद्रियों से परे जाकर हृदय में स्थायी छाप छोड़ देती हैं। हर खुशबू, एक स्मृति बनकर जीती है और हर स्मृति में प्रेम की गहराई झलकती है।

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कुछ नजारे ऐसे…

कुछ नज़ारे ऐसे होते हैं जो पूरी ज़िंदगी को समेटे रहते हैं। वे लौटकर फिर कभी नहीं आते, लेकिन जाते हुए भी दिखाई नहीं देते। कभी वे प्रेम-रस से भरे बादलों की तरह मन के भँवर को पागल बना देते हैं, तो कभी यादों के आकाश में उड़ते पंछियों की तरह हमें बीते दिन और रातें लौटा लाने को मजबूर करते हैं।

कुछ नज़ारे आँखों के काजल जैसे होते हैं, जो मन में फूलों की डोली सजा देते हैं और अपनी रंग-बिरंगी खुशबू से जीवन भर को महका जाते हैं। जब वे याद आते हैं, तो चेहरे पर एक मुस्कान ले आते हैं और यह अहसास कराते हैं कि जीवन में कोई प्यारा साथ है, जिसके साथ ज़िंदगी जीने लायक बनती है।

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“अस्तित्व”

“दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों की राहों में भी, छोटे-छोटे क्षण और यादें हमारे अस्तित्व को जीने का साहस और संबल देती हैं। गुप्तधन जैसे नन्हा दीपक, उड़ते पंछी, यादों की कुप्पी—ये सब हमें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों और अपने अस्तित्व के साथ जुड़ने का अनुभव कराते हैं।

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वो गाँव की कच्ची सड़क…

गाँव के बदलते स्वरूप और उसमें आने वाले शहरीकरण की भावनात्मक तस्वीर पेश करती है। कच्ची सड़कें अब काली, चौड़ी और बदल चुकी हैं, दोनों तरफ हरियाली से लहलहाते खेत अब दुकानों और व्यावसायिक स्थलों में बदल गए हैं। गाँव के लोग और उनकी सरल जीवनशैली धीरे-धीरे शहरी अंदाज़ और मुखौटे में बदल रही है। सुनार की जगह ज्वैलर्स, भड़भूजे और चने की जगह पॉपकॉर्न जैसी चीजें गाँव में जगह लेने लगी हैं। जबकि यह विकास और सुविधा का प्रतीक है, कवि अपने पुराने प्यार और ग्रामीण सादगी को याद करता है और मन में कचोट अनुभव करता है।

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विदाई गीत

आज विदाई का वह क्षण है, और मैं यहाँ अकेला खड़ा हूँ, यह सोचते हुए कि क्या कहूँ और शब्दों का सही चयन कैसे करूँ। मेरी आँखें भर आती हैं जब मैं अपने विद्यालय में पहले दिन की यादों को याद करता हूँ—वो उत्साह, वो नर्वसनेस, और दोस्तों के साथ की छोटी-छोटी शरारतें, जैसे क्लास में बंक मारना या किसी का टिफ़िन चुपके से ले जाना। वे निश्चिन्त, हँसी-खुशी भरे पल, दोस्तों के साथ की मस्ती, टीचरों को चिढ़ाना, खेल के मैदान और प्रार्थना की ध्वनि—ये सभी यादें हमेशा मेरे दिल में रहेंगी।

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देहरियों के पार..

एक स्त्री (या प्रतीक्षारत आत्मा) आकाश की नीली छाँव और हरियाली की गोद में खड़ी है। वह एक वृक्ष का सहारा लिए सदियों से प्रतीक्षा कर रही है—अपने चितचोर (प्रिय/प्रियतम) की खोज में। उसकी आँखें अपलक रास्ता निहार रही हैं और कान पदचाप की आहट सुनने को आतुर हैं।

समय गुज़रता गया, परंतु उसकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई। वह खुद को एक प्यासी नदी की तरह अनुभव करती है, जो कभी अमृत-सरीखी धारा बहाती थी, पर अब सूख चुकी है। फिर भी उसके भीतर यह विश्वास बना हुआ है कि उसका प्रिय अवश्य आएगा। यही एक सपना उसकी आँखों की रोशनी और मन की गर्माहट बनाए रखता है।

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वृद्धाश्रम में खिड़की के पास बैठी एक बुजुर्ग भारतीय माँ, हाथ में बेटे की फोटो, आंखों में इंतज़ार और दर्द

मस्‍त हवा का इक झौंका

यह कविता मां और बच्चों के प्रेम और यादों की भावनाओं को उजागर करती है। जीवन में अलगाव, पालन-पोषण और अंततः मातृत्व के अद्भुत बंधन को दर्शाती यह कविता भावनात्मक और मार्मिक है। प्रत्येक पंक्ति में माँ और बच्चे के बीच के गहरे प्यार और यादों का सौंदर्य दिखाई देता है।

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मैं कब से थी नीर की बदरी

कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।

फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।

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