नमन उन पितरों को, जिनसे है हमारी पहचान
पितृपक्ष केवल स्मरण का पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने वाले संस्कारों और धरोहरों का अनुभव है। पितर कहीं दूर नहीं जाते, वे हर आँगन, हर देहरी और हमारे हावभाव तक में बसे रहते हैं। उनकी दी हुई सीख और आशीष ही हमें जीवनभर संबल देती है और हमारी पहचान को सहेजती है।
