तोहमत लगा दीजिए
“तोहमत लगा दीजिए” प्रेम, शिकायत और अपनत्व की भावनाओं से सजी एक नाज़ुक ग़ज़ल है, जिसमें रिश्तों की मिठास और दिल की गहराइयों को खूबसूरती से व्यक्त किया गया है।

“तोहमत लगा दीजिए” प्रेम, शिकायत और अपनत्व की भावनाओं से सजी एक नाज़ुक ग़ज़ल है, जिसमें रिश्तों की मिठास और दिल की गहराइयों को खूबसूरती से व्यक्त किया गया है।
यह ग़ज़ल मोहब्बत, जुदाई और दिल की कश्मकश को बेहद खूबसूरती से बयां करती है। हर शेर में बिछड़ने का दर्द, इंतजार और यादों की टीस झलकती है, जो पाठक को भावनाओं की गहराई में डूबने पर मजबूर कर देती है।
कुछ मुलाकातें सिर्फ इत्तेफ़ाक़ नहीं होतीं, वे किस्मत की लिखी कहानी होती हैं। “यूँ ही तो नहीं” एक ऐसी ही ग़ज़ल है, जो इश्क़ और तक़दीर के अनोखे रिश्ते को उजागर करती है।
ह ग़ज़ल इश्क़, दर्द और तन्हाई की गहरी भावनाओं को बयां करती है। टूटे हुए दिल, अधूरे ख़्वाब और यादों के सहारे जीने की पीड़ा को बेहद खूबसूरती से शब्दों में पिरोया गया है।
“सुनो साहिब” एक कोमल और गहरी भावनाओं से भरी कविता है, जो प्रेम के उस एहसास को व्यक्त करती है जहाँ दो दिल धीरे-धीरे एक-दूसरे में समाने लगते हैं। यह रचना बताती है कि सच्चा प्रेम केवल शब्दों में नहीं, बल्कि हर सांस, हर धड़कन और हर ख्वाब में बस जाता है। जब मोहब्बत अपनी गहराई पर पहुँचती है, तो इंसान खुद को भी अपने प्रिय के भीतर खोजने लगता है। यह कविता समर्पण, अपनापन और आत्मीय जुड़ाव की खूबसूरत अभिव्यक्ति है।
यह ग़ज़ल यादों की उस नरम आहट को पकड़ती है, जो कभी चुपचाप दिल में उतर जाती है और फिर उम्रभर साथ रहती है। इसमें मोहब्बत के वो पल हैं, जो पूरे होकर भी अधूरे रह जाते हैं. नज़रों का झुकना, लबों का काँपना और मिलने से ज़्यादा बिछड़ने की कसक। हर शेर में एक ऐसी तन्हाई है, जो सिर्फ महसूस की जा सकती है, बयान करना आसान नहीं।
टूटते तारे से मांगी गई एक मन्नत और उसके बाद आई खबर यह कहानी इश्क, इंतजार और किस्मत की कड़वी सच्चाई को बयां करती है।
यह ग़ज़ल प्रेम, किस्मत, दौलत और आत्मसम्मान पर उठते सवालों की दास्तान है, जहाँ हर शेर जीवन की सच्चाई से रू-बरू कराता है।
वह ख्यालों में बार-बार आता रहा कभी याद बनकर सुलाता, कभी कसक बनकर रुलाता। कभी ज़ख़्मों पर मरहम था, तो कभी दिल की आग। साँसों में उसकी महक थी, बारिश की तरह वह बरसता रहा। जब दिल के दरवाज़े खुले, तो वही धड़कन बनकर बस गया। समय बेरहम था, इश्क़ पर परदा रहा और मैं, हर टूटन के बाद भी उसी को महसूस करती रही।
उस रात देर तक खिड़की के पास बैठी रही। सामने मेज़ पर रखा एक ख़त बार-बार उसकी नज़र खींचता, पर वह उसे खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। बाहर चाँदनी का उजाला कमरे में फैल गया था — उतना ही शांत और अकेला, जितना उसका मन। आईने में बार-बार खुद को निहारते हुए उसे महसूस हुआ कि वह सिर्फ़ अपने आप से बातें कर रही है। वह सोचती रही — जब मिलने नहीं आते, तो इस फ़ुर्सत का क्या करे? जब बिछड़ने का डर हर पल सताता है, तो इस दहशत का क्या करे? शायद यही मोहब्बत की लत है, जो छोड़ने से भी नहीं छूटती। और आखिर में, जब दोस्त कहते हैं “सब्र रख, गायत्री”, तो वह बस मुस्कुरा देती है — क्योंकि सब्र भी अब उसी की तरह थक चुका है।