बहू नहीं कोई देवी हो

यह कहानी नारी के कर्तव्य, परिश्रम और ससुराल में सम्मान पाने की प्रेरक कहानी है। नीरा, स्वभाव से मेहनती, संवेदनशील और न्यायप्रिय, अपने सास-ससुर के प्रति समर्पित रहती है। शादी के बाद पति के ड्यूटी पर चले जाने के बावजूद वह अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होती।

कठोर व्यवहार और अन्याय के बावजूद नीरा अपने नेकनीयती और परिश्रम से अपने सास-ससुर को उचित सम्मान दिलाती है। उसके इस समर्पण और अपनापन को देखकर परिवार और समाज भी उसे आदर और सम्मान देने लगते हैं। कहानी में नारी शक्ति, सशक्तता और पारिवारिक प्रेम का संदेश प्रमुख रूप से उजागर है।

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मां की आराधना में नारी

यह कविता नारी के महत्व, उसकी शक्ति और समाज में उसके सम्मान की आवश्यकता पर केंद्रित है। लाल चुनरी से सजा माँ का दरबार और नौ दिन की पूजा नारी की भक्ति और महिमा को दर्शाते हैं। कविता यह बताती है कि सृष्टि नारी के बिना नहीं चलती और जहाँ नारी का अपमान होता है, वहाँ पूजा-पाठ व्यर्थ है। विता में यह संदेश भी है कि नारी को कभी कमजोर नहीं बनना चाहिए। यदि उसके आत्म-सम्मान पर चोट पहुँचती है, तो उसे काली या चंडी के रूप में दुष्टों का विनाश करना चाहिए। साथ ही यह भी उजागर किया गया है कि आज भी कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियाँ जारी हैं और बेटियों की सुरक्षा समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर, यह कविता नारी सम्मान, शक्ति, साहस और जागरूकता का संदेश देती है।

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प्रेम में हो चले हैं हम दोनों थोड़े मूक और बधिर: अंजू सुंदर

लखनऊ से डॉ. अनुराधा पांडेय की रिपोर्ट लखनऊ– महिला काव्य मंच (मध्य) की लखनऊ इकाई की मासिक काव्य गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया।मुख्य अतिथि रहीं बिहार से लेखिका एवं संपादक प्रीति सिन्हा तथा विशिष्ट अतिथि रहीं उपाध्यक्ष प. रांची जि.इ./पू. सिंहभूम जि.इ. जमशेदपुर (संरक्षक) रिम्मी वर्मा। गोष्ठी का आरम्भ डॉ. राजेश कुमारी, राष्ट्रीय अध्यक्ष,…

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विधवाओं की दशा पर केंद्रित स्मारिका का लोकार्पण

महिला जागृति अभियान की पाँचवीं वर्षगांठ के अवसर पर इंदौर में आयोजित एक भव्य समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार अरुणा खरगोनकर द्वारा संपादित विधवाओं की दशा पर केंद्रित स्मारिका का लोकार्पण किया गया. आयोजन विचार प्रवाह साहित्य मंच के तत्वावधान में इंदौर प्रेस क्लब स्थित एक रेस्तरां के सभागार में हुआ, जहाँ बड़ी संख्या में महिलाएँ उपस्थित थीं.कार्यक्रम का शुभारंभ महाराष्ट्र में विधवा प्रथा उन्मूलन आंदोलन के जनक प्रमोद झिंझड़े, वरिष्ठ पत्रकार व समाजकर्मी प्रसून लतांत, इंदौर प्रेस क्लब के मुकेश तिवारी, विचार प्रवाह साहित्य मंच की अध्यक्ष सुषमा दुबे और समाज चिंतक मनीष खरगोनकर ने संयुक्त रूप से किया.

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नारी द्वारा नारीत्व का परित्याग

समाज में नारी की भूमिका और नारीत्व आज गंभीर परिवर्तन का सामना कर रहा है। जहाँ सदियों से नारी को ममता, कोमलता और जीवन देने वाले स्वरूप के रूप में देखा गया, वहीं अब वही नारी कई परिस्थितियों में अत्याचार, विषाक्त जीवन और अन्याय के खिलाफ प्रचंड स्वरूप धारण कर रही है।

कई मामलों में नारी अपने बच्चों या परिवार के प्रति परंपरागत ममता के बजाय अपने जीवन के बंधनों से मुक्त होने का प्रयास करती है। यह कदम कभी-कभी उस विषाक्त वातावरण का प्रतिरोध होता है, जो उसे हर दिन मानसिक और शारीरिक रूप से चोट पहुँचाता है।

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मुंबई में फिल्म राइटर के रूप में काम करती श्वेता बोथरा की प्रेरणादायक कहानी

शाबाश… श्वेता

उज्जैन के छोटे कस्बे महिदपुर रोड से आई श्वेता बोथरा ने हौसले, दृढ़ निश्चय और लगन से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। महेश भट्ट और अनु मलिक के साथ डेब्यू कर उन्होंने साबित कर दिया कि असंभव कुछ भी नहीं। शिक्षा पूरी करने और मीडिया मैनेजमेंट में एमबीए के बाद श्वेता ने ओरकॉम एडवरटाइजिंग, इंदौर से करियर शुरू किया, लेकिन लेखन का जुनून उन्हें मुंबई ले गया।

उनकी लिखी फिल्म “तू मेरी पूरी कहानी” एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसे प्यार और करियर के बीच कठिन निर्णय लेना होता है। श्वेता की कहानी हज़ारों लड़कियों और युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा है—सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए हौसला, मेहनत और जुनून ही सबसे बड़ा हथियार हैं।

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बदलता भारत

भारत आज तेजी से बदल रहा है। यह नवयुग की पहचान अपने भीतर समेटे, नवोन्मेष के पंख फैलाए हर सपना साकार करने की दिशा में बढ़ रहा है। गाँवों तक इंटरनेट पहुँच चुका है, खेतों में आधुनिक मशीनें उतर आई हैं। बच्चों की आँखों में अब नई दुनिया के सपने झिलमिलाते हैं और ज्ञान की धाराएँ पहले से कहीं अधिक सहजता से बह रही हैं।

जहाँ कभी चूल्हों के धुएँ से घर-आँगन भर जाया करते थे, वहाँ अब हर रसोई गैस की लौ से जगमगा रही है। किसान मौसम का हाल मोबाइल ऐप से जानते हैं और डिजिटल मंडी से अपने परिश्रम का उचित मूल्य पा रहे हैं।

शहरों में मेट्रो की गति-सी तेज़ सोच ने जन्म लिया है। स्टार्टअप्स एक नए उद्यमशील भारत की तस्वीर गढ़ रहे हैं। बेटियाँ अब चाँद तक पहुँच रही हैं और सीमा की रक्षा में भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। उनमें अब डर या बंधन नहीं, बल्कि हर मंज़िल हासिल करने का जज्बा है।

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महिला काव्य मंच लखनऊ इकाई की काव्य गोष्ठी संपन्न

महिला सशक्तिकरण एवं साहित्य साधना को समर्पित महिला काव्य मंच (मध्य) की लखनऊ इकाई द्वारा मासिक काव्य गोष्ठी का सफल ऑनलाइन आयोजन दिनांक 29 अगस्त 2025 को किया गया.
इस साहित्यिक आयोजन की मुख्य अतिथि रहीं डॉ. स्वदेश मल्होत्रा (अध्यक्ष, महिला काव्य मंच, अयोध्या) तथा विशिष्ट अतिथि रहीं डॉ. गीता मिश्रा. कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. राजेश कुमारी (राष्ट्रीय अध्यक्ष, शिक्षा मंच) के प्रस्तावना भाषण से हुआ. उन्होंने अपनी अध्यक्षीय उद्बोधन में मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए महिला काव्य मंच के उद्देश्यों और साहित्यिक गतिविधियों की सार्थकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने लखनऊ इकाई की सक्रियता और निरंतरता की सराहना करते हुए सभी कवयित्रियों को बधाई भी दी.

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छोड़ो ना अपना क्या जाता है… 

यह कविता हमारे समाज की उस लाचारी और बेपरवाही को सामने लाती है, जहाँ हर समस्या पर हम क्षणभर दुखी तो होते हैं, लेकिन अंततः जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। चाहे गटर में जान गंवाने वाला सफाईकर्मी हो, ढहते पुलों से बर्बाद होते परिवार हों, अस्पतालों में इलाज़ के अभाव में मरते लोग हों या शिक्षा का बाज़ारीकर हर अन्याय और त्रासदी हमें झकझोरती है, पर अंत में वही विचार मन में गूंजता है: *“अपना क्या जाता है?”* यह रचना समाज से संवेदनशील और जिम्मेदार होने की पुकार है।

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नारी — जननी भी, शक्ति भी

नारी गहनों या दौलत की चाह नहीं रखती, उसे चाहिए सिर्फ़ सम्मान और बराबरी का हक़। वह माँ है, बहन है, बेटी है और पत्नी है—हर रूप में जीवन को सँवारती है। उसके भी अपने सपने हैं, अपनी इच्छाएँ हैं। लेकिन समाज अक्सर उसे कमज़ोर समझकर उसकी स्वतंत्रता छीनने की कोशिश करता है। सच्चाई यह है कि नारी कोमल ज़रूर है, पर निर्बल नहीं। वह कर्तव्यों का पालन करती है और प्रेम से जीती है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उसकी भावनाओं और अस्तित्व का सम्मान करें।

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