महिला काव्य मंच लखनऊ इकाई की काव्य गोष्ठी संपन्न

महिला सशक्तिकरण एवं साहित्य साधना को समर्पित महिला काव्य मंच (मध्य) की लखनऊ इकाई द्वारा मासिक काव्य गोष्ठी का सफल ऑनलाइन आयोजन दिनांक 29 अगस्त 2025 को किया गया.
इस साहित्यिक आयोजन की मुख्य अतिथि रहीं डॉ. स्वदेश मल्होत्रा (अध्यक्ष, महिला काव्य मंच, अयोध्या) तथा विशिष्ट अतिथि रहीं डॉ. गीता मिश्रा. कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. राजेश कुमारी (राष्ट्रीय अध्यक्ष, शिक्षा मंच) के प्रस्तावना भाषण से हुआ. उन्होंने अपनी अध्यक्षीय उद्बोधन में मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए महिला काव्य मंच के उद्देश्यों और साहित्यिक गतिविधियों की सार्थकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने लखनऊ इकाई की सक्रियता और निरंतरता की सराहना करते हुए सभी कवयित्रियों को बधाई भी दी.

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नारी — जननी भी, शक्ति भी

नारी गहनों या दौलत की चाह नहीं रखती, उसे चाहिए सिर्फ़ सम्मान और बराबरी का हक़। वह माँ है, बहन है, बेटी है और पत्नी है—हर रूप में जीवन को सँवारती है। उसके भी अपने सपने हैं, अपनी इच्छाएँ हैं। लेकिन समाज अक्सर उसे कमज़ोर समझकर उसकी स्वतंत्रता छीनने की कोशिश करता है। सच्चाई यह है कि नारी कोमल ज़रूर है, पर निर्बल नहीं। वह कर्तव्यों का पालन करती है और प्रेम से जीती है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उसकी भावनाओं और अस्तित्व का सम्मान करें।

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क्या है मानव जीवन?

मानव जीवन एक रहस्यमय विरोधाभास है —
जहाँ देवताओं का श्राप और असुरों का वरदान साथ चलते हैं।नदी बहती है, पर नाव उलटी धारा में संघर्ष करती है।पर्वत-सा हौसला और झरनों-सी भावना साथ जन्म लेते हैं,पर बादलों-सी वेदना और लहरों-सी कामना भी पीछे-पीछे आती हैं।यह यात्रा पगडंडी से शिखर तक,मकड़ियों-से भटकाव से लेकरभस्म में बदल जाने तक जाती है —और फिर भी, मुक्ति के द्वार बंद रहते हैं,अनंत खोज में भटकती आत्मा के लिए।

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संवाद

यह रचना संवाद की इच्छा के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं, मानवीय भावनाओं और सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करती है। कवयित्री अपने मन की गहराइयों से उन क्षणों और पात्रों से बात करना चाहती है जो प्रकाश और अंधकार, प्रेम और वियोग, सम्मान और अपमान, मर्यादा और अन्याय, त्याग और पीड़ा के प्रतीक हैं। वह आकाश के अंधकार, स्वाति नक्षत्र की बूंद, सुगंधित पुष्प, शहीद की मां, परंपराओं से पीड़ित नारी, दहेज से आहत पिता, बिछड़े प्रेमी, व्यथित पुरुष, राम की मर्यादा, बुद्ध के धर्म ज्ञान और अश्रु की स्थिर बूंद तक—हर उस संवेदनशील अनुभव से जुड़ना चाहती हैं जो मनुष्य के भीतर गहराई से स्पंदित होता है। यह संवाद आत्मा की पुकार है, जो जानती है कि शब्द शायद परिभाषित न कर पाएं, लेकिन मौन में भी हृदय की पीड़ा सजीव हो उठती है।

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सृष्टि रचयिता : नारी      

नारी को अबला कहना उसके अस्तित्व के साथ अन्याय है। वह सृष्टि की रचयिता, संवेदना की मूरत और असीम शक्ति की प्रतीक है। धूप, सर्दी, गर्मी और जीवन के हर थपेड़े सहकर भी वह संसार में सौंदर्य और संतुलन भरती है। कभी दुर्गा, कभी चंडी, वह मानव जाति का अभिमान है। फिर भी इतिहास में सीता, द्रौपदी और गांधारी जैसी अनेक नारियां अन्याय सहने को विवश क्यों हुईं? क्या परिवार का संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी सिर्फ उसी की है? सवाल यही है कि हर नारी रानी लक्ष्मीबाई या रानी दुर्गावती की तरह साहसी और प्रतिकार करने वाली क्यों नहीं बन पाती।

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‘सावन की सहेलियां’ में खूब बिखरीं तीज की छटा

पारीक समाज महिला मंडल, पुणे द्वारा सावन और तीज के पावन पर्व को बड़ी धूमधाम और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। “सावन की सहेलियाँ” नामक इस सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन खासतौर पर समाज की महिलाओं के लिए किया गया, जिसमें पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीतों और नृत्य ने सभी को सावन के उल्लास में डुबो दिया।

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बेंगलुरु में सावन मिलन महोत्सव धूमधाम से सम्पन्न

सिद्धार्थ सांस्कृतिक परिषद, आरटी नगर, बेंगलुरु की महिला शाखा द्वारा सावन मिलन महोत्सव अत्यंत धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम बिहार भवन, बेंगलुरु में आयोजित किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता अमिता झा जी ने अत्यंत सौंदर्यपूर्ण ढंग से की। कार्यक्रम में उपाध्यक्ष ऊषा झा और डॉ. अर्चना झा एवं बिंदु सिंह जी ने सक्रिय भागीदारी निभाई। सचिव डेज़ी शर्मा और अपर्णा शर्मा की भी उत्साहपूर्ण सहभागिता रही। समिति की कोषाध्यक्ष निधि शर्मा तथा सदस्य हीरा झा और शीला सिंह ने भी आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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हरियाली तीज : हरियाली, सौंदर्य और आस्था का पर्व

श्रावण मास की हरियाली और वर्षा ऋतु की ताजगी के बीच मनाया जाने वाला हरियाली तीज पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नारी शक्ति, सौंदर्य और सांस्कृतिक समृद्धि का उत्सव भी है। भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन की स्मृति में मनाए जाने वाले इस पर्व में महिलाएँ निर्जला व्रत रखती हैं, पारंपरिक श्रृंगार करती हैं, लोकगीतों की स्वर लहरियाँ बिखेरती हैं और झूले की लय में प्रकृति से जुड़ती हैं। इस दिन महिलाएँ हरे रंग के वस्त्र पहनती हैं, हाथों में मेंहदी रचाती हैं, सोलह श्रृंगार करती हैं और पारंपरिक आभूषणों से सजती हैं। हरे रंग को इस पर्व का विशेष रंग माना जाता है, जो हरियाली, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक है। महिलाएँ एक-दूसरे के घर जाकर लोकगीत गाती हैं, पारंपरिक नृत्य करती हैं और झूले झूलती हैं, जो सावन के इस त्योहार की एक विशिष्ट पहचान है।

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ना रोक खुद को अब…

हर कठिनाई से लड़ने की ताकत रखती है तू, तो फिर सुन स्त्री, अब अपने स्त्री होने पर शर्म नहीं, गर्व किया कर। जहाँ मन लगे, वहाँ दिल लगाना तेरा अधिकार है, और आईने में मुस्कुराकर खुद को पहचानना भी। तू सिर्फ जिम्मेदारियों में नहीं, हक़ में भी जी सकती है – खुद से प्यार कर, खुद को सजा, और दुनिया को दिखा कि तू क्या है।”

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सपनों की कोई सरहद नहीं…

बिहार के छोटे से शहर से निकलकर देश-विदेश में अपनी साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों से पहचान बनाने वाली रंजीता सिंह फ़लक आज महिलाओं के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन चुकी हैं। स्वयंसिद्धा संस्था के माध्यम से वह महिलाओं को सशक्त बनाने का कार्य कर रही हैं, वहीं कविकुंभ पत्रिका और अपने चर्चित काव्य संग्रहों के जरिए साहित्य जगत में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कर चुकी हैं।

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