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“कोमल नहीं, मजबूत है कलाई”

स्त्री केवल कोमल नहीं, बल्कि परिवार और समाज की धुरी है। संस्कार, व्रत, उपवास और साधना के माध्यम से वह न केवल अपने भीतर शक्ति और संयम विकसित करती है, बल्कि पूरे परिवार को एक सूत्र में बाँधती है। यह कविता स्त्री की आंतरिक ऊर्जा, परंपरा और सशक्तिकरण को उजागर करती है।

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सुहाग पर्व करवा चौथ

यह कविता भारतीय विवाहिता की भावनाओं और सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती है। माता-पिता से विदा होकर नए घर में प्रवेश, पति के प्रति समर्पण और सुहागन होने का गौरव इसमें प्रमुख हैं। सोलह श्रृंगार, लाल चुनरी, मांग टीका, मेहंदी, पायल, चूड़ियाँ और मंगलसूत्र जैसे आभूषण उसकी पारंपरिक सुंदरता और सांस्कृतिक पहचान को उजागर करते हैं। कविता में करवाचौथ व्रत और चौथ माता से अखंड सुहाग की कामना का भी उल्लेख है। यह अंश स्त्री के नए गृह जीवन, आशाओं और प्रेम भरे संबंधों की महत्ता को भावपूर्ण रूप से व्यक्त करता है।

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स्वाभिमान

हर रोज मैट्रो स्टेशन पर भीख मांगती वह अंधी भिखारन मेरी नजरों के सामने होती।
एक दिन उसकी तबियत ठीक न होने पर मैंने देखा कि उसकी देखभाल एक जवान लड़की कर रही थी। कई सालों के दर्द और असहायता के बावजूद, उस बच्ची ने उसकी सेवा को अपना स्वाभिमान बना लिया। भीख मांगना नहीं, बल्कि सहयोग और मानवता की यही असली पहचान है।

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हिंदी साहित्य भारती : राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ का गठन

हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु समर्पित अंतरराष्ट्रीय संस्था हिंदी साहित्य भारती ने मुंबई, महाराष्ट्र में राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ की नई इकाई का गठन किया।

कार्यक्रम का आयोजन द प्रेसीडेंसी रेडियो क्लब में किया गया, जिसकी अध्यक्षता श्रीमती संजना लाल ने की। महानगर कोलकाता से पधारी डॉ. सुनीता मंडल, अध्यक्ष, हिंदी साहित्य भारती राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ, ने सभी साहित्यकारों और कवयित्रियों का स्वागत करते हुए महिला प्रकोष्ठ की कार्यप्रणाली और उद्देश्यों को साझा किया।

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त्यौहार

त्यौहार का समय फिर से आया। हल्दी-कुमकुम का त्यौहार आया, सुहागिनों ने श्रृंगार किया, गजरा सजाया, माथे पर बिंदी लगाई, हरि-हरी चूड़ियाँ पहनी, हाथों में मेहंदी लगी और गोटा वाली साड़ियाँ पहनीं। पर उस विधवा ने न तो चमकीली साड़ी पहनी, न ही टीका सजाया, और उसके हाथ भी खाली थे। एक बहन थी, जो पति की सताई हुई थी, वह दरिंदे को छोड़कर घर वापस चली आई। सगुना भी रह गई थी, बिन ब्याही, क्योंकि ग़रीब बाबा उसकी सगाई नहीं कर पाए थे।
उनके हाथों में मेहंदी नहीं थी, पांवों में पायल नहीं थी, चूड़ियों की खनक भी नहीं थी। वह सभी भावों से घायल थीं। उन्हें हल्दी-कुमकुम में जाने की मनाही थी। सब बेरंग, गुमसुम और मुरझाई हुई थीं। वेदना की बूँदें उनकी आँखों में समाई हुई थीं।। सभी को हर त्यौहार पर समान अधिकार मिले। तभी पुरुष प्रधान समाज में भी सभी नारियों का सम्मान होगा और रंग भरी क्यारियाँ सुरभित होंगी।

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इसी तरह सोचो

यह कविता जीवन और संघर्ष की कठिनाइयों में महिलाओं को आत्मनिर्भर और साहसी बनने का संदेश देती है। कविता में बताया गया है कि जैसे लोहा आग में पिघलकर भी अपनी ताकत नहीं खोता, वैसे ही महिलाओं को भी कठिन परिस्थितियों में अपने साहस और आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। ‘बिटिया’ के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि जीवन के जंगल में जिंदा रहने के लिए हिम्मत, धैर्य और साहस आवश्यक हैं।

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बहू नहीं कोई देवी हो

यह कहानी नारी के कर्तव्य, परिश्रम और ससुराल में सम्मान पाने की प्रेरक कहानी है। नीरा, स्वभाव से मेहनती, संवेदनशील और न्यायप्रिय, अपने सास-ससुर के प्रति समर्पित रहती है। शादी के बाद पति के ड्यूटी पर चले जाने के बावजूद वह अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होती।

कठोर व्यवहार और अन्याय के बावजूद नीरा अपने नेकनीयती और परिश्रम से अपने सास-ससुर को उचित सम्मान दिलाती है। उसके इस समर्पण और अपनापन को देखकर परिवार और समाज भी उसे आदर और सम्मान देने लगते हैं। कहानी में नारी शक्ति, सशक्तता और पारिवारिक प्रेम का संदेश प्रमुख रूप से उजागर है।

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मां की आराधना में नारी

यह कविता नारी के महत्व, उसकी शक्ति और समाज में उसके सम्मान की आवश्यकता पर केंद्रित है। लाल चुनरी से सजा माँ का दरबार और नौ दिन की पूजा नारी की भक्ति और महिमा को दर्शाते हैं। कविता यह बताती है कि सृष्टि नारी के बिना नहीं चलती और जहाँ नारी का अपमान होता है, वहाँ पूजा-पाठ व्यर्थ है। विता में यह संदेश भी है कि नारी को कभी कमजोर नहीं बनना चाहिए। यदि उसके आत्म-सम्मान पर चोट पहुँचती है, तो उसे काली या चंडी के रूप में दुष्टों का विनाश करना चाहिए। साथ ही यह भी उजागर किया गया है कि आज भी कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियाँ जारी हैं और बेटियों की सुरक्षा समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर, यह कविता नारी सम्मान, शक्ति, साहस और जागरूकता का संदेश देती है।

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प्रेम में हो चले हैं हम दोनों थोड़े मूक और बधिर: अंजू सुंदर

लखनऊ से डॉ. अनुराधा पांडेय की रिपोर्ट लखनऊ– महिला काव्य मंच (मध्य) की लखनऊ इकाई की मासिक काव्य गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया।मुख्य अतिथि रहीं बिहार से लेखिका एवं संपादक प्रीति सिन्हा तथा विशिष्ट अतिथि रहीं उपाध्यक्ष प. रांची जि.इ./पू. सिंहभूम जि.इ. जमशेदपुर (संरक्षक) रिम्मी वर्मा। गोष्ठी का आरम्भ डॉ. राजेश कुमारी, राष्ट्रीय अध्यक्ष,…

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विधवाओं की दशा पर केंद्रित स्मारिका का लोकार्पण

महिला जागृति अभियान की पाँचवीं वर्षगांठ के अवसर पर इंदौर में आयोजित एक भव्य समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार अरुणा खरगोनकर द्वारा संपादित विधवाओं की दशा पर केंद्रित स्मारिका का लोकार्पण किया गया. आयोजन विचार प्रवाह साहित्य मंच के तत्वावधान में इंदौर प्रेस क्लब स्थित एक रेस्तरां के सभागार में हुआ, जहाँ बड़ी संख्या में महिलाएँ उपस्थित थीं.कार्यक्रम का शुभारंभ महाराष्ट्र में विधवा प्रथा उन्मूलन आंदोलन के जनक प्रमोद झिंझड़े, वरिष्ठ पत्रकार व समाजकर्मी प्रसून लतांत, इंदौर प्रेस क्लब के मुकेश तिवारी, विचार प्रवाह साहित्य मंच की अध्यक्ष सुषमा दुबे और समाज चिंतक मनीष खरगोनकर ने संयुक्त रूप से किया.

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