सावन, राखी और एक खाली दहलीज़
हर बेटी के लिए मायका सिर्फ़ घर नहीं, सांसों की मिट्टी होता है।पर कुछ बेटियों के हिस्से वो आँगन नहीं आता, जहां राखी, सावन और तीज मुस्कुराते थे। उनके त्योहार भी सादे, आंखें भीगी, और दिल भीतर से थोड़ा रिक्त रहता है…

हर बेटी के लिए मायका सिर्फ़ घर नहीं, सांसों की मिट्टी होता है।पर कुछ बेटियों के हिस्से वो आँगन नहीं आता, जहां राखी, सावन और तीज मुस्कुराते थे। उनके त्योहार भी सादे, आंखें भीगी, और दिल भीतर से थोड़ा रिक्त रहता है…
सुबह की चाय का कप हाथ में लिए मैं अख़बार पढ़ रही थी कि एक खबर ने जैसे दिल को भीतर तक हिला दिया इंदौर में बस में छूटा नवजात शिशु, मां-बाप फरार.
खबर छोटी थी, पर असर बड़ा. कुछ पंक्तियों में लिखी उस घटना के पीछे जाने कितनी कहानियां दबी थीं. लिखा था. एक दंपत्ति बस में सवार हुए, गोद में एक नन्हा सा बच्चा था, मुश्किल से पंद्रह दिन का. थोड़ी देर बाद वे बोले कि कुछ सामान लेना है, बस से उतर गए.
दिनभर की भागदौड़ के बाद भी जाह्नवी के मन में अपनी नन्ही बेटी की यादें बेचैनी बनकर उमड़ती रहीं। अंधेरी राहों पर अकेले चलती हुई माँ की यह यात्रा सिर्फ घर लौटने की नहीं, बल्कि मातृत्व की उस दैवीय शक्ति का प्रमाण थी जो हर बाधा को पार कर जाती है। जब मन सच्चा हो, तो ईश्वर भी मददगार बनकर रास्ते में उतर आते हैं।
कभी-कभी निस्वार्थ प्रेम पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं। आँखों में चमक तो होती है—कभी हीरे की, कभी तारे की—पर दोनों की चमक में अंतर होता है, दिखावे का। दोनों दृष्टिगत होते हुए भी दृष्टि की गहराई में फर्क ममता का होता है। तारा ऊँचाई पर है, हीरा गहराई में; दोनों ही दुर्लभ हैं, पर दिल की दूरी उन्हें अलग करती है। किसी को विरासत में सूर्य की रोशनी और चाँद का आशीर्वाद मिलता है, तो कोई अंधेरी अमावस के कुओं से अंधेरा पीता है। सच्ची परख गुमनाम परतों में छिपी होती है, कवि की कल्पनाओं में नहीं—उसे पहचानने के लिए लंबे हाथ नहीं, गहराई चाहिए। शायद इसी कारण, कभी-कभी ममता पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है।
माँ के दिव्य स्वरूप और मातृत्व, शक्ति, और ममता की अनुभूति का सुंदर चित्रण करती है। इसमें कवि माँ को आकाश सा विशाल हृदय और धरती का धीरज रखने वाली मानते हैं, जो बिना मांगे सब देती हैं और हर समय अपने भक्तों के साथ रहती हैं। कवि माँ से सुख-दुख में साथ रहने, हर सांस में उनका आशीर्वाद पाने और जीवन में उनके दर्शन करने की प्रार्थना करता है। यह कविता भक्ति, श्रद्धा और आत्मीय स्नेह का प्रतीक है, जो माँ की महिमा और उसके संरक्षण की भावना को उजागर करती है।
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“पचपन नहीं… छप्पन बरस हो गए हमारी शादी को।”वृद्धा ने हँसते हुए कहा, और वृद्ध भी मुस्करा दिए। सुबह से ही फोन की ट्रिन-ट्रिन ने उन्हें परेशान किया था, पर अब समझ आया. यह बच्चों की शुभकामनाओं की आवाज़ें थीं।
यादों की परतें खुलीं—इलाहाबाद के दिन, बच्चों की हंसी, कंधों पर बैठा कर दिखाई गई चौकी, रजाई के भीतर की मूँगफली… और आज वही बच्चे हिसाब मांगते हैं, शिकायतें करते हैं। पर इस सुबह आदित्य के गुलदस्ते और अर्चना की हंसी नेवृद्ध दंपति की आँखों को बारिश की बूँदों-सा चमका दिया।
“स्त्री जब प्रेम में छल खाती है या विवाह में अपमान सहती है, तब उसकी संवेदना टूटी हुई कांच की तरह बिखर जाती है। ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति होकर भी वह अधूरी कहानी लिखने पर विवश होती है। कभी अपने बच्चों की गलत परवरिश का दोष भी उसी पर आता है, तो कभी परिवार के विघटन का बोझ भी उसके कंधों पर डाल दिया जाता है। यदि नारी नफ़रतों के बीज बोना छोड़ दे और पुरुष अन्याय पर अपनी सहमति न दे, तभी प्रेम का प्रकाश फैलेगा और समाज में करुणा का पुनर्जन्म होगा। जिस दिन प्रेम हर हृदय में विस्तारित होगा, उस दिन नारी सचमुच लक्ष्मी स्वरूपा बनकर पूजी जाएगी।