सामाजिक कविता
भागी हुई बेटी का पिता
एक बेटी के घर छोड़ जाने के बाद पिता के मन में उठने वाले अपराधबोध, गुस्से, सामाजिक अपमान और अंततः प्रेम की स्वीकृति का बेहद मार्मिक चित्रण। यह कविता केवल एक पिता की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय समाज की जटिल मानसिकता और रिश्तों की गहरी पड़ताल है।
मंटो, सच आज भी वही है दोस्त…
“मंटो… सच आज भी वही है दोस्त…” समाज, ज़रूरत, गरीबी और संवेदनहीनता की उन परतों को उजागर करती कविता है, जहाँ हालात इंसान और व्यवस्था दोनों को बेनकाब कर देते हैं।
“नारी केवल देह नहीं”
नारी केवल देह नहीं” नारी के अस्तित्व, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक गौरव पर आधारित एक विचारोत्तेजक हिंदी कविता है। यह रचना नारी को केवल बाहरी रूप से नहीं, बल्कि त्याग, ममता, शक्ति और संस्कृति की वाहक के रूप में देखने का संदेश देती है।
जननी से जगजननी तक
आज के परिवेश में कुछ नारियाँ भी भयावह कांड करने वाली हो गई हैं। विविध अशोभनीय, असंवेदनशील और निर्दयी घटनाओं को देखकर हृदय द्रवित हो उठता है। पर ऐसा होने के पीछे दशकों से नारी पर किए गए अत्याचारों का परिणाम भी कहा जा सकता है, जिसके कारण वह असहनशील और संवेदनाहीन होकर जघन्य अपराध कर रही हैं। पर संभलना तो होगा उन नारी रूपों को, जो ऐसे कृत्य कर रही हैं।
क्योंकि, हे नारी! तू ही तो सृष्टि की आधारशिला है। यदि तू ही अपने जन्मे बच्चों को खा जाएगी, तो यह सृष्टि आगे कैसे बढ़ेगी? सृष्टि ही समाप्त हो जाएगी, क्योंकि तू ही तो जननहारी है। इन्हीं भावों को निम्न कविता में समेटने का प्रयास किया है नारी को चैतन्य करने के लिए….
सपनों पर चलती लाठियाँ
यह कविता उन विद्यार्थियों की पीड़ा और संघर्ष को स्वर देती है, जो सपनों और उम्मीदों का बोझ लेकर शिक्षा के मंदिरों तक पहुँचते हैं, लेकिन कई बार सम्मान के बजाय संदेह और कठोरता का सामना करते हैं। कविता शिक्षा व्यवस्था, अनुशासन और संवेदनशील संवाद के बीच संतुलन की आवश्यकता पर गहरा प्रश्न उठाती है।
