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“मन की देहरी: संवेदनाओं का प्रवेशद्वार”

“‘मन की देहरी’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जो पाठक को भीतर तक छू जाता है। पूनम सिंह जी की सरल और भावपूर्ण कविताएँ प्रेम, स्मृति और स्त्री-मन की गहराई को उजागर करती हैं। प्रत्येक पंक्ति जैसे पाठक के अपने अनुभवों का प्रतिबिंब है। एक पुस्तक जो संवेदनाओं और आत्मिक प्रेम का संसार खोलती है।”

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सावन में प्रियतम की प्रतीक्षा करती प्रेमिका का भावपूर्ण दृश्य

विरह

निशा की नीरवता में बैठी नायिका प्रतीक्षा में लिपटी है .हवा में भीगी चाँदनी, शरीर पर ओस की बूँदें जैसे भावना का स्पर्श कर रही हों। वह प्रिय के आगमन की राह में सजी-संवरी है, मानो सावन स्वयं प्रेम का संदेश लेकर आया हो। मन में उमड़ती आशाओं से मोतियों का हार पिरोती, पलकें प्रतीक्षा की लाली से भीग उठी हैं।

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प्रेम में…

प्रेम जब आया, तो स्त्री न केवल पत्नी रही, न प्रेयसी वह मां बन गई, धारण करने वाली, संभालने वाली। पुरुष भी न प्रेमी बन सका, न पूरा आदमी; वह तो जैसे शिशु हो गया, स्नेह और सहारे पर टिका हुआ। प्रेम ने पशु से भी पशुत्व छीन लिया और वह संत-सा शांत और सहज हो उठा। तब लगा, प्रेम कोई साधारण भाव नहीं यह क्रांति है,

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इंतज़ार

ज़िंदगी ने बस इतना ही सिखाया है कि इंतज़ार भी एक उम्र माँगता है। न जाने कितनी रातें, कितने दिन तेरी याद में गुज़र गए। खामोशी बहुत कुछ कहती है, पर जब दिल नहीं समझ पाता, मैं फ़िज़ाओं के बीच आकर तेरे दीदार की आस लगा बैठता हूँ। अब तो ये हवाएँ भी थकी-सी लगती हैं .मानो ये भी चाहती थीं कि एक दिन मेरी खामोशी मुस्कान में बदल जाए।

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ऑनलाइन की हरी बत्ती..

हर रात एक ही इंतज़ार स्क्रीन पर उसका ऑनलाइन दिखना। बातों में कुछ ख़ास नहीं, पर उस हरी बत्ती के पीछे जैसे एक रिश्ता साँस लेता है। उसकी हर “गुड मॉर्निंग” कमरे की ख़ामोशी में रोशनी भर देती है, और मैं फिर अगले इंतज़ार में डूब जाता हूँ।

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प्रेम और नफ़रत

प्रेम वह शक्ति है जो जीवन को जोड़ती है और नफ़रत वह आग है जो उसे भस्म कर देती है। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मुस्कान होती है; जहाँ नफ़रत होती है, वहाँ विनाश। इसलिए प्रेम बाँटिए, नफ़रत छोड़िए क्योंकि प्रेम ही सच्ची मानवता है।

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संदेह और संबंध…

संदेह हर बार अविश्वास से नहीं, बल्कि संवाद की कमी से जन्म लेता है। जब शब्द थक जाते हैं और मौन लंबा हो जाता है, तब मन कल्पनाओं से भर जाता है। पर यदि हम सच से संवाद करें, तो संदेह भी संबंध को सुधारने का अवसर बन सकता है। क्योंकि प्रेम का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि समझ और सच्चाई में विश्वास है।

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गठरी…

उसने आवाज दी, और मैं चल पड़ी—अपनी भावनाओं की गठरी उठाए हुए। पास पहुंचने पर जाना कि उसके मन की हर गली कितनी सँकरी है, हर कोना कितना सीमित। उन सँकरी गलियों में चलते-चलते मैं खुद भी सिकुड़ गई। चारों ओर अँधेरा था, और मैं उसी अँधेरे में भटकती हुई आखिरकार उसके पास पहुँची। वह वहाँ था. खुश, बेफिक्र और अपने आप में मशगूल। न उसे मेरा इंतज़ार था, न मेरी कोई ज़रूरत। तब एहसास हुआ जहाँ ज़रूरत नहीं, वहाँ ठहरना नहीं चाहिए। मगर लौटने का रास्ता तो मैं भूल चुकी थी। अब वही सवाल मन में गूंजता है मैं क्या करूँ? इस भावनाओं की गठरी का बोझ कैसे उठाऊँ?

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parijat - poetry - reeta - mishra

ओ पारिजात

रात गहरी हो रही है और हवा में पारिजात की सुगंध घुल रही है। मैं जागता हूँ और कविताएँ लिखता हूँ, पर शब्द अब इस खुशबू में मदहोश होने लगे हैं। मैं रंगों की सुंदरता नहीं चाहता .मुझे तो प्रेम का वही लाल रंग चाहिए जो आत्मा को महका दे। मैं चाहता हूँ कि मैं पारिजात के आँगन की उसी मिट्टी में बो दिया जाऊँ, और वहीं लगातार महकता रहूँ। इस सिंदूरी भोर में, एक स्पर्श भर से मेरी कविता फिर जीवित हो उठी है।

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river

नदी के आँसू

दी रोती भी है—पर पहाड़ उसकी आँखों के आँसू देख ही कहाँ पाते हैं। वो अपनी ऊँचाई की अकड़ में तने रहते हैं। उन्हें लगता है नदी तो बस बादलों की आवारा सखी है, बहती है, गुज़रती है… बस।

पर हक़ीक़त यह है कि पहाड़ की ऊँचाई को हरियाली, जीवन, शब्दसब कुछ नदी ही देती है। वही उसके अस्तित्व को अर्थ देती है। ऊँचाई अकेली कुछ नहीं होती गहराई चाहिए। और गहराई नदी ही देती है।

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