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सुर संगम साथ मिले

कविता मानवीय हृदय की उन गहरी इच्छाओं को प्रकट करती है जो भौतिक सुख-संपदा से परे, आत्मिक शांति और सच्चे प्रेम की खोज में हैं। कवि ने “प्रारम्भी नेह” में जीवन को एक ऐसे वन के रूप में देखा है जहाँ वह चंदन जैसी सुगंध और गुलशन जैसी सुंदरता चाहता है, परंतु उसे एहसास है कि धन और वैभव उसके साथ नहीं रहेंगे। इसलिए वह जीवन में सुर-संगम अर्थात् आत्मिक सामंजस्य की चाह रखता है।

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माँ एक दैवीय शक्ति

दिनभर की भागदौड़ के बाद भी जाह्नवी के मन में अपनी नन्ही बेटी की यादें बेचैनी बनकर उमड़ती रहीं। अंधेरी राहों पर अकेले चलती हुई माँ की यह यात्रा सिर्फ घर लौटने की नहीं, बल्कि मातृत्व की उस दैवीय शक्ति का प्रमाण थी जो हर बाधा को पार कर जाती है। जब मन सच्चा हो, तो ईश्वर भी मददगार बनकर रास्ते में उतर आते हैं।

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अंधेरे …

यह कविता जीवन की अंधेरी राहों में प्रेम, परिवार और आत्मबल की रोशनी तलाशती है। कवि कहता है. अंधेरे चाहे कितना भी घेर लें, हम एक-दूसरे को छोड़कर नहीं जाएंगे। थकी हुई आत्मा को सहारा देने के लिए सच्चा प्रेम ही पर्याप्त है। रिश्तों की डोर अगर प्यार से जोड़ी जाए तो परिवार हमेशा साथ रहता है। समय के कठिन क्षणों में सब साथ छोड़ जाते हैं, फिर भी प्रेम और आशा के सितारे जगमगाते हैं।

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“मिलन और बिछोह

**Excerpt:**

कुछ लोग ज़िंदगी में ऐसे मिलते हैं जैसे उनका मिलना तय था — न पहले, न बाद में। वे आते हैं, अपना किरदार निभाते हैं और चले जाते हैं, जैसे कभी थे ही नहीं। पीछे रह जाती हैं उनकी यादें, फोन में उनका नंबर, कुछ जगहें जो अब भी उनकी मौजूदगी की खुशबू से भरी हैं। मिलना जितना सुख देता है, बिछड़ना उतना ही गहरा दर्द छोड़ जाता है।

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तेरी बिंदिया रे…..

जहां शायरों ने, कवियों ने, औरत की सुंदरता के लिए अनेकों उपमानों का प्रयोग किया है, जैसे झील सी गहरी आंखें, हिरण सी सुंदर आंखें, सुराही दार गर्दन, मोरनी सी चाल, वहीं एक प्रेमी, अपनी प्रेमिका की बिंदी पर मर मिटा है,और वह चाहता है कि चाहे वह और कोई श्रृंगार करें या ना करें ,सिर्फ एक छोटी सी बिंदी वह अपने माथे पर लगा ले, और उसे किसी भी उपमान की जरूरत नहीं होगी।

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दिलरुबा और दिल

बिट्ट जैन सना, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई काम आई न दिल्लगी दिल की।ये कभी क्या हुई किसी दिल की। इश्क़ वालों के साथ ही अक्सर।ज़ेह्न से दुश्मनी हुई दिल की। आशिक़ी में है सिर्फ़ आह-ओ-फ़ुग़ाँ,कब हुई किसको आगही दिल की। दिल हमेशा जवान रहता है,उम्र बढ़ती नहीं कभी दिल की। आज उस दिलरुबा को देखा तो,ख़ुद-ब-ख़ुद…

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डाक चाचा: पत्रों में बसी यादें

डाकिया हमारे बचपन और ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। उनका नाम सुनते ही एक अलग ही दुनिया आंखों के सामने जीवंत हो उठती — खाकी वर्दी, साइकिल की खड़खड़ाहट और हाथों में थैला। वे सिर्फ़ पत्र और पार्सल नहीं लाते थे, बल्कि अपनों का प्यार, उम्मीद और आशीर्वाद भी अपने साथ लाते थे। इस लेख में हम उन दिनों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं, जब हर चिट्ठी का इंतजार दिल की धड़कनें बढ़ा देता था और हर पार्सल में खुशी और उत्सुकता समाई होती थी।

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महकते ख़्वाबों की रात

घर मेरा किसी अनजानी ख़ुशबू से महकने लगा था। जाने क्यों, हर कोने में उसकी आहट गूंजने लगी। फ़िज़ाओं में कोई चाप नहीं थी, फिर भी सन्नाटा जैसे टूटने लगा। मैंने तो किवाड़ बंद रखे थे, पर लगता है कोई ख़्वाब दरवाज़ा खटखटा गया। रातें अब पहले जैसी तन्हा नहीं रहीं — एक उम्मीद थी कि शायद दूरी मिटेगी, और इसी ख़याल से दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। जब आखिर मैंने दरवाज़ा खोला, तो हवाओं के साथ आए अरमानों का दीया बुझ गया — जैसे किसी अधूरी मुलाक़ात ने अपनी कहानी वहीं ख़त्म कर दी हो।

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तुम और मैं : दो छोर, एक डोर

हम कितने अलग हैं — फिर भी साथ हैं।
तुम दिन हो, उजले और स्पष्ट, जबकि मैं रात हूं — रहस्यमयी, गहराई में डूबी हुई।
तुम स्थिर तट की तरह शांत हो, और मैं बहते झरने की तरह बेफिक्र, निरंतर गतिमान।
तुम पर्वत की तरह अडिग और दृढ़ हो, जबकि मैं हवा की तरह चंचल, हर दिशा में बिखरती हुई।

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करवा चौथ

साँझ के धुँधलके में जब दीपों की कतारें आँगन को सजाती हैं, हवा में करवा चौथ का सुगंधित उत्सव घुल जाता है। थाली में सिन्दूर, करवा में भरा प्यार — सब कुछ उस एक भाव के इर्द-गिर्द घूमता है जो समय की हर परीक्षा में अडिग रहा है। चाँद निकलने से पहले ही मन अपने चाँद को निहार लेता है — वही तो उसका सहारा है, वही उसका संसार। भूख-प्यास का एहसास प्रेम की ऊष्मा में कहीं विलीन हो जाता है। करवा की लौ झिलमिलाती है, जैसे रिश्तों की डोर — अटूट, पवित्र और उजली। प्रतीक्षा में बँधी आँखों में बस एक ही नाम गूंजता है, एक ही आकांक्षा साँसों में बसती है

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