दिलरुबा और दिल

बिट्ट जैन सना, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई काम आई न दिल्लगी दिल की।ये कभी क्या हुई किसी दिल की। इश्क़ वालों के साथ ही अक्सर।ज़ेह्न से दुश्मनी हुई दिल की। आशिक़ी में है सिर्फ़ आह-ओ-फ़ुग़ाँ,कब हुई किसको आगही दिल की। दिल हमेशा जवान रहता है,उम्र बढ़ती नहीं कभी दिल की। आज उस दिलरुबा को देखा तो,ख़ुद-ब-ख़ुद…

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डाक चाचा: पत्रों में बसी यादें

डाकिया हमारे बचपन और ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। उनका नाम सुनते ही एक अलग ही दुनिया आंखों के सामने जीवंत हो उठती — खाकी वर्दी, साइकिल की खड़खड़ाहट और हाथों में थैला। वे सिर्फ़ पत्र और पार्सल नहीं लाते थे, बल्कि अपनों का प्यार, उम्मीद और आशीर्वाद भी अपने साथ लाते थे। इस लेख में हम उन दिनों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं, जब हर चिट्ठी का इंतजार दिल की धड़कनें बढ़ा देता था और हर पार्सल में खुशी और उत्सुकता समाई होती थी।

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महकते ख़्वाबों की रात

घर मेरा किसी अनजानी ख़ुशबू से महकने लगा था। जाने क्यों, हर कोने में उसकी आहट गूंजने लगी। फ़िज़ाओं में कोई चाप नहीं थी, फिर भी सन्नाटा जैसे टूटने लगा। मैंने तो किवाड़ बंद रखे थे, पर लगता है कोई ख़्वाब दरवाज़ा खटखटा गया। रातें अब पहले जैसी तन्हा नहीं रहीं — एक उम्मीद थी कि शायद दूरी मिटेगी, और इसी ख़याल से दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। जब आखिर मैंने दरवाज़ा खोला, तो हवाओं के साथ आए अरमानों का दीया बुझ गया — जैसे किसी अधूरी मुलाक़ात ने अपनी कहानी वहीं ख़त्म कर दी हो।

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तुम और मैं : दो छोर, एक डोर

हम कितने अलग हैं — फिर भी साथ हैं।
तुम दिन हो, उजले और स्पष्ट, जबकि मैं रात हूं — रहस्यमयी, गहराई में डूबी हुई।
तुम स्थिर तट की तरह शांत हो, और मैं बहते झरने की तरह बेफिक्र, निरंतर गतिमान।
तुम पर्वत की तरह अडिग और दृढ़ हो, जबकि मैं हवा की तरह चंचल, हर दिशा में बिखरती हुई।

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करवा चौथ

साँझ के धुँधलके में जब दीपों की कतारें आँगन को सजाती हैं, हवा में करवा चौथ का सुगंधित उत्सव घुल जाता है। थाली में सिन्दूर, करवा में भरा प्यार — सब कुछ उस एक भाव के इर्द-गिर्द घूमता है जो समय की हर परीक्षा में अडिग रहा है। चाँद निकलने से पहले ही मन अपने चाँद को निहार लेता है — वही तो उसका सहारा है, वही उसका संसार। भूख-प्यास का एहसास प्रेम की ऊष्मा में कहीं विलीन हो जाता है। करवा की लौ झिलमिलाती है, जैसे रिश्तों की डोर — अटूट, पवित्र और उजली। प्रतीक्षा में बँधी आँखों में बस एक ही नाम गूंजता है, एक ही आकांक्षा साँसों में बसती है

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काश के फूल

डॉ. मंजूलता, प्रसिद्ध साहित्यकार, नोएडा काश! मैं फूल होती काश कातुम्हारे मानस-पटल परपड़ी स्याह परतों परअपने नर्म-नर्म फूलों सेरुई के फाहे-सा ढक देती। ख़्वाहिशें जो तुम्हारीदबी-दबी-सी हैं, उन्हें काश के फूलों केउड़ते-हिलते फाहों सेसजा देती। बिखरते तो ख़्वाहिशों की तरहकाश के फूल भी,पर शरद ऋतु आतेकहाँ रोक पाते खिलनेसे ख़ुद को! तेरे मन में भी…

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प्रेम में पहाड़ होना

प्रेम केवल सहज अनुभव नहीं, बल्कि वह पहाड़ की तरह दृढ़ और विशाल भी हो सकता है। यह मन की गहराई से उत्पन्न होता है, तब जब शब्द भी लवों पर आने में संकोच करते हैं। प्रेम में केवल नदी या सागर की तरंगें नहीं, बल्कि वह इतनी शक्ति रखता है कि व्यक्ति पहाड़ बन जाए। यह केवल प्रेमी और प्रेमिका का रिश्ता नहीं है, बल्कि वह पीड़ा को भी अपने साथ बहा ले जाता है, सूर्य के ताप, चाँद की शीतलता, ऋषियों की तपस्या और हवन की अग्नि की तरह विस्तृत और बलिदानी होता है। प्रेम, त्याग और शिव के तांडव की भांति, कभी शांत, कभी उग्र — लेकिन हमेशा अमर और अडिग है।

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क्या करूँ

उस रात देर तक खिड़की के पास बैठी रही। सामने मेज़ पर रखा एक ख़त बार-बार उसकी नज़र खींचता, पर वह उसे खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। बाहर चाँदनी का उजाला कमरे में फैल गया था — उतना ही शांत और अकेला, जितना उसका मन। आईने में बार-बार खुद को निहारते हुए उसे महसूस हुआ कि वह सिर्फ़ अपने आप से बातें कर रही है। वह सोचती रही — जब मिलने नहीं आते, तो इस फ़ुर्सत का क्या करे? जब बिछड़ने का डर हर पल सताता है, तो इस दहशत का क्या करे? शायद यही मोहब्बत की लत है, जो छोड़ने से भी नहीं छूटती। और आखिर में, जब दोस्त कहते हैं “सब्र रख, गायत्री”, तो वह बस मुस्कुरा देती है — क्योंकि सब्र भी अब उसी की तरह थक चुका है।

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मां…

“मॉं” में माँ को जीवन का आधार, हृदय की आवाज़ और आत्मा का सहारा बताया गया है। माँ केवल काया नहीं, बल्कि माया, अनुशासन, संस्कार और ईश्वर की आराधना का प्रतीक हैं। बच्चे की किलकारी, परिवार का बंधन और घर की यादें माँ की खुशी और शक्ति का हिस्सा हैं। कविता यह दर्शाती है कि माँ का अस्तित्व, उनका स्नेह और उनका मार्गदर्शन जीवन की हर परिस्थिति में अनमोल हैं और उनके नाम का पन्ना कभी फटता नहीं।

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आसरा

पने भीतर के अदृष्ट संसार और भावनाओं की गहराई को व्यक्त करती हैं। यह कविता यादों, अनुभवों और उन कहानियों की प्रतीक है जो हमारे मन में ठहरी रहती हैं—जैसे कवियों की स्मृतियाँ, वर्जीनिया का मौन, मीरा का विस्मय और अजनबी महिलाओं की अधूरी चिट्ठियां। इस अदृश्य संसार के बीच, कवयित्री अपने विचारों को हर रात धीरे-धीरे खो देती हैं, जैसे कोई ज्योत अपने ही प्रकाश से थक गई हो। अंततः, एक प्रिय व्यक्ति की निस्पंद धड़कनों में मिलने वाला आसरा उसे थके हुए मन को सहारा देने और हृदय का भार साझा करने की अनुभूति कराता है।

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