सच या मान्यता ?

हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही देखने और मानने लगते हैं। यही प्रवृत्ति “कंफर्मेशन बॉयस” कहलाती है। सच्चाई चाहे कुछ भी हो, हमारा दिमाग उसे उसी रूप में देखना चाहता है जैसा हम मानते हैं। यही कारण है कि किसी व्यक्ति, विचार या विचारधारा से जुड़ने के बाद हम उसकी गलतियाँ भी नजरअंदाज कर देते हैं। असल में दिक्कत सच्चाई में नहीं होती दिक्कत हमारे देखने के “चश्मे” में होती है। कई बार दाग हकीकत में नहीं, चश्मे पर ही होते हैं।

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केसी कॉलेज का इंटर कॉलेजिएट फेस्ट “किरण” 13 से

-किशनचंद चेल्लाराम (केसी) कॉलेज का प्रतिष्ठित इंटर कॉलेजिएट फेस्ट किरण सिर्फ एक फेस्ट नहीं रह गया है, बल्कि अपने समय की एक ऐसी उत्कृष्ट सांस्कृतिक प्रस्तुति बन चुका है, जिसे हर वर्ष विद्यार्थी, शिक्षक और प्रतिभागी लंबे समय तक याद रखते हैं. एन.एच.एस.आर.ई. की डायरेक्टर और एचएसएनसी यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर कर्नल प्रो. डॉ. हेमलता बागला ने कहा कि हर तरफ त्यौहारों का माहौल है,

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ग़ज़ल

यह बात ज़ात-पात की नहीं, सोच और नज़रिया की है।हर बात की तह में जाने की आदत कभी फ़ायदा देती है, कभी सुकरात की तरह जान भी ले लेती है।
चींटी की कहानी सिखाती है कि औक़ात जानकर, शांत रहकर आगे बढ़ना ही बुद्धिमानी है। बच्चों को भी यही समझ देना चाहिए कि हर अनजानी बात पर भरोसा न करें।

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दीवार

कहानी एक सफल लेकिन अकेले हो चुके इंसान— रविन्द्र के दर्द को दिखाती है। महंगे बंगले, नाम, शोहरत और पैसा होने के बावजूद वह अंदर से टूट चुका है, क्योंकि उसकी माँ अब नहीं रही। उसने माँ से वादा किया था कि उसे हर सुख देगा, पर उसी “बड़े मकान की दीवारों” ने बेटे और माँ के बीच दूरी बना दी। माँ शायद आख़िरी वक़्त में दर्द में थी, पर रविन्द्र को पता न चला क्योंकि “दीवारों” ने आवाज़ और अहसास रोक लिए।रविन्द्र आज पछता रहा है कि असली घर प्यार और साथ से बनता है, दीवारों से नहीं।यही दर्द और पछतावा पूरी कहानी का मूल है।

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जज़्बातों का मेला है ज़िंदगी

ज़िंदगी कोई साधारण चीज़ नहीं, यह भावनाओं, यादों, रिश्तों और एहसासों का कुल योग है। यह क़ीमती भी है, तकलीफ़देह भी है, लेकिन हर पल हमारे बहुत पास है।

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मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ… बस एक बार

रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर आज अमर और सुहानी ने एक क़ैफे में मिलने का तय किया था…अमर आज किसी कारण से सुहानी के शहर आया हुआ था.अमर और सुहानी पहली बार मिलने वाले थे…..अमर ने सुहानी से कई बार मिलने की रिक्वेस्ट की थी. शायद वैसे ही कह दिया करता था, क्योंकि वो भी…

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बे-इख़्तियार मोहब्बत

मोहब्बत अजीब है…जिन्हें हमारी कद्र नहीं, हम वहीं अपनी रूह रख आते हैं।हम उनके लिए हर लम्हा ख़यालों में सुलगते रहते हैं,और वो हमारी बे-ख़ुदी की ख़बर तक नहीं लेते। शिकायत भी नहीं कर सकते…क्योंकि इश्क़ में इख़्तियार हमारा होता ही कहाँ है।

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तुम्हारे चश्मे और मेरी हसरतें…

तुम्हारी उन काजलभरी आँखों पर जब तुम चश्मा लगाती हो न…मुझे लगता है, हमारे बीच एक काँच की दीवार खड़ी हो जाती है।मैं चाहता हूँ इन आँखों में अपना अक्स साफ़ उतरते देखूँ,और ख़ुद पर रश्क कर सकूँ।

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एक दिवाली बचपन वाली…

वो दिवाली, जिसमें दीपक छोटे थे, पर हमारी खुशियाँ बहुत बड़ी। जिसमें घर की सफाई भी खेल थी, और कबाड़ में से गुम चीज़ मिल जाना किसी खजाने से कम नहीं। जिसमें पटाखों की आवाज़ें नहीं… हमारी हँसी की गूँज ज़्यादा थी।जिसमें मिठाईयों की खुशबू थी, और त्योहारों में सजे संस्कार। वो दिवाली… जो परंपरा के साथ हमारी मासूमियत को भी रोशन कर देती थी।

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अहसास का रिश्ता

बुढ़ापे में अकेलेपन से लड़ते-लड़ते थक चुके थे दोनों। बच्चे अपनी दुनिया में चले गए थे। सुबह की वॉक में बस हल्की सी “नमस्ते” होती थी. लेकिन उसी छोटी-सी मुस्कान ने भीतर कहीं एक गहरी पहचान बना दी थी। फिर धीरे-धीरे चाय, ग़ज़लें, खाना, बीमार पड़ने पर ख़याल… और एक दिन एहसास हुआ. हम तो एक-दूसरे के सहारे फिर से जीना सीख गए हैं।प्यार कभी उम्र नहीं देखता।
कभी देर से ही सही . पर सच्चा साथ मिल जाता है।

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