निर्बल की तुम ढाल बनना
निर्बल की तुम ढाल बनना एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है जो मानवता, करुणा और सहानुभूति का संदेश देती है। यह रचना हमें सिखाती है कि जो कमजोर हैं, उन्हें सहारा देना और उनके आँसू पोंछना ही सच्ची इंसानियत है।

निर्बल की तुम ढाल बनना एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है जो मानवता, करुणा और सहानुभूति का संदेश देती है। यह रचना हमें सिखाती है कि जो कमजोर हैं, उन्हें सहारा देना और उनके आँसू पोंछना ही सच्ची इंसानियत है।
सुमेरा को सोने की चूड़ियों का बड़ा शौक था। बचपन से ही बस यही उसका इकलौता ख़्वाब था। उसे पूरा करने के लिए वह सिलाई और ट्यूशन करके पैसे जोड़ रही थी। आज वही सारी बचत उसने भाई की मेडिकल कॉलेज की फीस के लिए बड़ी खुशी से निकाल दी।
निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार का बेटा मेडिकल की पढ़ाई करेगा यह बात अपने-आप में बहुत बड़ी थी।
यह कविता आधुनिक जीवन की भागदौड़, दौलत की अंधी दौड़ और सुकून से दूर होते इंसान की विडंबना को उजागर करती है। “मेरी-मेरी” में उलझे मनुष्य की मानसिकता और खोते मानवीय संबंधों पर यह एक गहरी, आत्ममंथन कराती हुई टिप्पणी है।
“बिल्ली का अफसोस” एक रोचक व्यंग्य कविता है जिसमें बिल्ली के माध्यम से बदलते समाज, खत्म होते अंधविश्वास और घटते रुतबे पर मज़ेदार कटाक्ष किया गया है।
होटल में बैठा एक परिवार तरह-तरह की रोटियों का ऑर्डर दे रहा था। तभी पिता बाहर मिली एक भूखी वृद्धा का ज़िक्र करते हैं, जो केवल एक सूखी रोटी की आस लगाए बैठी थी। यह सुनकर बेटा चुपचाप अपनी प्लेट से रोटियाँ लेकर बाहर चला जाता है। लौटते समय उसके शब्द सभी के दिल को छू लेते हैं रोटी का असली स्वाद उसकी किस्म में नहीं, बल्कि किसी भूखे का पेट भरने के बाद मिलने वाले सुकून में होता है।
भारत में “तिरंगा” शब्द भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को संदर्भित करता है। हर स्वतंत्र राष्ट्र का अपना ध्वज होता है, जो उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज को उसके वर्तमान स्वरूप में 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता से कुछ दिन पहले, 22 जुलाई 1947 को आयोजित संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था। यह 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में और उसके बाद भारत गणराज्य के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में कार्य करता रहा।
आज के दौर में प्यार अब केवल कैंडललाइट डिनर और बड़े सरप्राइज़ तक सीमित नहीं रहा। साझा ज़िम्मेदारियों, रोज़मर्रा के कामों और एक-दूसरे का साथ निभाने में पनपता यह नया ट्रेंड कोरमांस आधुनिक रिश्तों को एक नई, टिकाऊ परिभाषा दे रहा है।
“नया मन” केवल एक कविता नहीं, बल्कि जड़ हो चुके विचारों, पूर्वाग्रहों और दूषित सामाजिक यथार्थ के विरुद्ध एक संवेदनशील पुकार है। यह रचना ऐसे नए मन, नए विचार और नई चेतना की कल्पना करती है, जो निष्कलुष, मानवीय और सत्यनिष्ठ हो। कविता पाठक को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है और एक बेहतर समाज की संभावना को स्वर देती है।
क स्त्री का अपने पति के नाम लिखा गया यह मार्मिक पत्र उसके जीवन के उन अनकहे दर्दों को उजागर करता है, जो प्रेम की चाह, उपेक्षा और रिश्तों की खामोशी के बीच धीरे-धीरे उसे भीतर से तोड़ देते हैं।
वो दिवाली, जिसमें दीपक छोटे थे, पर हमारी खुशियाँ बहुत बड़ी। जिसमें घर की सफाई भी खेल थी, और कबाड़ में से गुम चीज़ मिल जाना किसी खजाने से कम नहीं। जिसमें पटाखों की आवाज़ें नहीं… हमारी हँसी की गूँज ज़्यादा थी।जिसमें मिठाईयों की खुशबू थी, और त्योहारों में सजे संस्कार। वो दिवाली… जो परंपरा के साथ हमारी मासूमियत को भी रोशन कर देती थी।