बरडिया परिवार द्वारा जीव दया और गौ सेवा
महिदपुर रोड के गोगापुर गौशाला में बरडिया परिवार द्वारा जीव दया और गौ सेवा का प्रेरणादायक आयोजन किया गया। इस अवसर पर जैन समाज की गरिमामयी उपस्थिति में सेवा, श्रद्धा और धर्म का अद्भुत संगम देखने को मिला।

महिदपुर रोड के गोगापुर गौशाला में बरडिया परिवार द्वारा जीव दया और गौ सेवा का प्रेरणादायक आयोजन किया गया। इस अवसर पर जैन समाज की गरिमामयी उपस्थिति में सेवा, श्रद्धा और धर्म का अद्भुत संगम देखने को मिला।
श के ग्रामीण इलाकों में गेहूं की कटाई और मड़ाई के दौरान थ्रेसर मशीनों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। जहां ये मशीनें किसानों की मेहनत को आसान बनाती हैं, वहीं इनके कारण होने वाले हादसों में भी लगातार वृद्धि देखी जा रही है। यह घटनाएं केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे कई परिवारों का दर्द और टूटते सपने छिपे होते हैं।
“जिन अंग्रेजों के ज्ञान को हम श्रेष्ठ मानते हैं, उन्हें जैविक खाद का ज्ञान बिहार और इंदौर के अनपढ़ किसानों ने दिया था। यही कारण है कि ‘इंदौर कंपोस्ट सिस्टम’ को वैश्विक पहचान मिली और गांधीजी स्वयं इसे समझने इंदौर आए। 1925 में अल्बर्ट हॉवर्ड ने इंदौर में कंपोस्ट खाद पर शोध कर पूरी दुनिया को प्राकृतिक खेती का संदेश दिया। सौ साल पहले भारतीय किसान पेड़ों की पत्तियों, गोबर और प्राकृतिक अवशेषों से जो खाद बनाते थे, वही आज भी मिट्टी की सेहत के लिए सबसे उपयोगी है। इंदौर नगर निगम ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने वार्डों में कंपोस्ट खाद प्लांट लगाकर आधुनिक नगरीय कृषि में नया अध्याय जोड़ा है।”
यह कविता प्रेम, भक्ति और समर्पण की भावना को दर्शाती है, जहाँ प्रेम के माध्यम से ईश्वर का अनुभव होता है।
प्रेम जब आया, तो स्त्री न केवल पत्नी रही, न प्रेयसी वह मां बन गई, धारण करने वाली, संभालने वाली। पुरुष भी न प्रेमी बन सका, न पूरा आदमी; वह तो जैसे शिशु हो गया, स्नेह और सहारे पर टिका हुआ। प्रेम ने पशु से भी पशुत्व छीन लिया और वह संत-सा शांत और सहज हो उठा। तब लगा, प्रेम कोई साधारण भाव नहीं यह क्रांति है,
साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, पर आज यह स्त्री-मन की गहराइयों का भी प्रतिबिंब बन चुका है। ‘अवनि से अंबर तक’ में सुप्रसन्ना जी ने नारी के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मातृत्व और आत्मबोध को अत्यंत संवेदनशीलता से उकेरा है। उनकी कविताएँ कभी मुस्कान बनकर खिलती हैं, तो कभी वेदना बनकर हृदय को भिगो देती हैं। यह काव्य-संकलन न केवल स्त्री-अस्तित्व की खोज है, बल्कि समाज की बदलती संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज भी है।
यह कविता प्रकृति के विनाश पर चिंता और संरक्षण का संदेश देती है। कवि दिखाता है कि जब पर्यावरण आहत होता है, तो धरती की सुंदरता और जीवन का संतुलन दोनों बिगड़ जाते हैं। वह मानव से आग्रह करता है कि जंगल बचाए, प्रदूषण रोके और संसाधनों का संयमित उपयोग करे। अंत में कवि आशा जताता है कि यदि हम प्रकृति से प्रेम करें और उसकी रक्षा करें, तो धरती फिर से हरियाली, सुगंध और आनंद से भर जाएगी।
एक दिन के लिए ‘पुस्तकों की राजधानी’ बन गया. शहर के स्कूलों, कॉलेजों, ऑफिसों, मेट्रो, बस स्टैंड, धार्मिक स्थलों और आईटी पार्कों में लोगों ने एक साथ किताबें खोलकर ऐसा माहौल बनाया, मानो पूरा शहर एक विशाल ओपन लाइब्रेरी में बदल गया हो. ग्रुप रीडिंग की लगभग १०,००० तस्वीरें सोशल मीडिया पर छा गईं और आयोजन को राजेश पांडे, रमेश पाटील, योगेश शिंदे, स्वाति देशमुख, प्रिया जाधव के नेतृत्व में ‘शांतता.. पुणेकर वाचत आहे’ अभियान को बड़ी सफलता मिली. शाम ५ बजे तक १ लाख ३५ हज़ार से ज़्यादा लोगों ने किताबें पढ़ीं और फोटो अपलोड करके वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया
क्या कुछ लोगों के व्यवहार के आधार पर पूरी Gen Z पीढ़ी को कठघरे में खड़ा करना उचित है? यह विचार लेख शिक्षा, संस्कार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर चर्चा करता है। लेखक का मत है कि भारत के अधिकांश युवा मेहनती, जागरूक और संस्कारी हैं तथा कुछ घटनाओं के आधार पर पूरी पीढ़ी की छवि बनाना उचित नहीं है। यह लेख समसामयिक मुद्दे पर संवाद और आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है।
यह कविता उस माँ की पीड़ा को स्वर देती है, जिसने जीवन भर अपनी संतान को सींचा, सँवारा और बड़ा किया, लेकिन अंत में उसी से वृद्धाश्रम जाने का आदेश मिला। यह रचना समाज से एक करुण सवाल पूछती है क्या माँ का अब कोई ठौर नहीं?