नागपुर की बाल कवियित्री मिहूं अग्रवाल सम्मानित
लखनऊ में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में नागपुर की बाल कवियित्री मिहूं अग्रवाल को उनकी उत्कृष्ट साहित्यिक प्रतिभा के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया।

लखनऊ में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में नागपुर की बाल कवियित्री मिहूं अग्रवाल को उनकी उत्कृष्ट साहित्यिक प्रतिभा के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया।
यह लेख हमारे समय के उस भ्रम को उजागर करता है जिसमें “बड़े होने” को ही “बेहतर होने” का पर्याय मान लिया गया है, और बताता है कि कैसे यही सोच नई प्रतिभाओं और अवसरों को दबा देती है।
मातारानी की महिमा असीमित और अनन्य है। सृष्टि की हर क्रियाशीलता में उनका वंदन और पूजन होता है। दया, शांति, चेतना और सामर्थ्य के प्रतिरूप के रूप में, माँ ज्ञान से पूर्ण प्रकाशपुंज हैं। वह जीवन की सर्वशक्तिप्रदायिनी हैं, जो समस्त जगत की असुरी शक्तियों का संहार करती हैं और यश, रूप, आरोग्य व सौभाग्य प्रदान करती हैं।
माँ अमिय-स्रोत जैसी निरंतर नाद करती हैं और दुष्टों का दमन करने के लिए विकराल रूप धारण कर लेती हैं। प्रचंड दामिनी और रमा कामिनी के स्वरूप में वह भक्तों के हर संताप को हरती हैं और उनके मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।
यह ग़ज़ल मोहब्बत, जुदाई और दिल की कश्मकश को बेहद खूबसूरती से बयां करती है। हर शेर में बिछड़ने का दर्द, इंतजार और यादों की टीस झलकती है, जो पाठक को भावनाओं की गहराई में डूबने पर मजबूर कर देती है।
जीवन एक मधुर संगीत की तरह है, जिसमें सुख और दुःख उसके स्वरों की भाँति आते-जाते रहते हैं। संयम, विश्वास और परहित की भावना से भरा यह जीवन, गीता के ज्ञान को आत्मसात कर हर भव से पार हो सकता है। जब मन ईर्ष्या और लोभ से मुक्त होकर आशा, ममता और सत्य को अपनाता है, तब जीवन स्वयं एक संगीतमय चमन बन जाता है।
सुबह की चाय का कप हाथ में लिए मैं अख़बार पढ़ रही थी कि एक खबर ने जैसे दिल को भीतर तक हिला दिया इंदौर में बस में छूटा नवजात शिशु, मां-बाप फरार.
खबर छोटी थी, पर असर बड़ा. कुछ पंक्तियों में लिखी उस घटना के पीछे जाने कितनी कहानियां दबी थीं. लिखा था. एक दंपत्ति बस में सवार हुए, गोद में एक नन्हा सा बच्चा था, मुश्किल से पंद्रह दिन का. थोड़ी देर बाद वे बोले कि कुछ सामान लेना है, बस से उतर गए.
अहिल्या की प्रतीक्षा के रूपक में लिखी यह कविता एक स्त्री के भीतर के पत्थर हो चुके दर्द और अधूरी चाहत की सजीव अभिव्यक्ति है।
यह कहानी एक बच्चे के मन में छिपे लालच से शुरू होकर संवेदना और बाँटने की सीख तक पहुँचती है। सड़क किनारे मजदूर बच्चों को बिस्किट बाँटते देख उसका मन बदल जाता है और वह समझ पाता है कि खुशी जमा करने में नहीं, बाँटने में है।