एक भारतीय परिवार का भावनात्मक दृश्य जिसमें दादा-दादी, माता-पिता और एक बेटी पारंपरिक माहौल में साथ खड़े हैं; बेटी आदरपूर्वक बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर रही है, घर में स्नेह, संस्कार और पारिवारिक मूल्यों का वातावरण दिखाई दे रहा है।

रिवाज़ और रिश्तों की रखवाली

यह कविता रिश्तों, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों की गहराई को दर्शाती है, जिसमें बुज़ुर्गों का सम्मान, बेटियों की सुरक्षा और समाज के प्रति जिम्मेदारी का सुंदर संदेश दिया गया है।

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खानदानी लोग

मेहनत और आत्मसम्मान के बल पर आगे बढ़ी मीना, शोध के दौरान अपने मार्गदर्शक राहुल से प्रेम कर बैठती है। तीन वर्षों के संबंध के बाद राहुल जाति-घमंड और स्वार्थ के आगे प्रेम को नकार देता है। मीना के सपने, विश्वास और आत्मा सब एक साथ टूट जाते हैं, और वह सामाजिक क्रूरता का नंगा सच देखती है।

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मन की उड़ान और उसकी बेड़ियाँ

यह कविता मन की उस द्वंद्व यात्रा को बयाँ करती है जहाँ सपनों की उड़ान और समाज के बंधन आमने-सामने खड़े हैं। कवि कहता है — मन को बाँध कर रखो, क्योंकि उसकी उड़ानें सुविधाओं और परिस्थितियों की सीमाओं से टकराती हैं।
यह रचना उस गहराई को छूती है जहाँ स्वतंत्रता की चाह और जिम्मेदारियों की जकड़न एक साथ सांस लेती हैं।

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पिता से घूमने जाने की अनुमति मांगती बेटी का भावनात्मक दृश्य

पिताजी को कैसे मनाना…

“पिताजी को कैसे मनाना है” एक भावपूर्ण हिंदी कविता है, जिसमें दोस्तों के साथ समय बिताने की इच्छा और पिता से अनुमति लेने की मासूम दुविधा को सरल और हृदयस्पर्शी शब्दों में व्यक्त किया गया है।

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खूबसूरत हिंदी ग़ज़ल: हौसलों को न गिराया कर

उम्मीदों की ग़ज़ल

यह खूबसूरत ग़ज़ल जीवन के गहरे सत्य को सरल शब्दों में व्यक्त करती है। इसमें प्रेम, धैर्य, हौसला और आत्मविश्वास का संदेश छिपा है। ज़िन्दगी कठिन हो सकती है, मगर उसे अपनाना ही जीत है। टूटे ख्वाबों के बाद भी हिम्मत बनाए रखना, दिल की हर बात हर किसी से न कहना और रोशनी को बांटते रहना ये ग़ज़ल इन्हीं जीवन मूल्यों को सलीके से सामने लाती है। हर शेर इंसान को भीतर से मजबूत बनने, खुद से जुड़ने और उम्मीद की लौ जलाए रखने की प्रेरणा देता है।

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महिला काव्य मंच लखनऊ इकाई की काव्य गोष्ठी संपन्न

महिला सशक्तिकरण एवं साहित्य साधना को समर्पित महिला काव्य मंच (मध्य) की लखनऊ इकाई द्वारा मासिक काव्य गोष्ठी का सफल ऑनलाइन आयोजन दिनांक 29 अगस्त 2025 को किया गया.
इस साहित्यिक आयोजन की मुख्य अतिथि रहीं डॉ. स्वदेश मल्होत्रा (अध्यक्ष, महिला काव्य मंच, अयोध्या) तथा विशिष्ट अतिथि रहीं डॉ. गीता मिश्रा. कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. राजेश कुमारी (राष्ट्रीय अध्यक्ष, शिक्षा मंच) के प्रस्तावना भाषण से हुआ. उन्होंने अपनी अध्यक्षीय उद्बोधन में मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए महिला काव्य मंच के उद्देश्यों और साहित्यिक गतिविधियों की सार्थकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने लखनऊ इकाई की सक्रियता और निरंतरता की सराहना करते हुए सभी कवयित्रियों को बधाई भी दी.

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बेटी की सफलता और माँ के समर्थन को दर्शाती प्रेरणादायक लघुकथा का दृश्य

सौ सुनार की, एक लोहार की

सौ सुनार की, एक लोहार की!” एक प्रेरणादायक लघुकथा है, जिसमें एक माँ अपनी बेटी के सपनों के साथ खड़ी होती है और बेटी अपनी मेहनत से समाज की सोच को करारा जवाब देती है।

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ज़िंदगी आखिर कट ही जाएगी

ज़िंदगी अंत में कट ही जाती है चाहे हम मोहब्बत में डूबे हों या किसी की नफ़रत से लड़ रहे हों। कभी दर्द के साये में गुज़रती है, तो कभी हँसी की छोटी-सी किरण उसे रोशन कर देती है।
जीवन की यही सच्चाई है: दो पल का सफ़र, जो हाथ से फिसलते हुए भी हमें कुछ सिखा जाता है। खुशियाँ छोटी हों या बड़ी, बाँट देने से ही दिल हल्का होता है। ग़मों को अंदर दबाकर रखने से वे बोझ बन जाते हैं लेकिन किसी अपने के साथ उन्हें साझा कर लिया जाए तो वही दर्द ताकत में बदल जाता है।

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भारतीय रेल यात्रा के दौरान परिवार के साथ रखा पारंपरिक बिस्तरबंद

बिस्तरबंद: जब सफ़र में घर साथ चलता था

एक समय था जब हर यात्रा का सबसे भरोसेमंद साथी “बिस्तरबंद” होता था। उसमें सिर्फ बिस्तर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सहूलियत, बचपन की जिज्ञासाएँ और सफ़र की गर्माहट बंद होती थी। आज भले ही एयरबैग ने उसकी जगह ले ली हो, पर यादों में बिस्तरबंद अब भी ज़िंदा है।

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तुम और मैं : दो छोर, एक डोर

हम कितने अलग हैं — फिर भी साथ हैं।
तुम दिन हो, उजले और स्पष्ट, जबकि मैं रात हूं — रहस्यमयी, गहराई में डूबी हुई।
तुम स्थिर तट की तरह शांत हो, और मैं बहते झरने की तरह बेफिक्र, निरंतर गतिमान।
तुम पर्वत की तरह अडिग और दृढ़ हो, जबकि मैं हवा की तरह चंचल, हर दिशा में बिखरती हुई।

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