मैं कब से थी नीर की बदरी

कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।

फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।

Read More

बिहार में 100 विश्वविद्यालय खोलने की पहल

बिहार में शिक्षा की दिशा और दशा सुधारने के लिए शिक्षाविद्? और साहित्यकार ई. अंशु सिंह ने एक अनूठी पहल की है. शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्होंने बिहार में 100 विश्वविद्यालय खोलने के लक्ष्य के साथ राज्यव्यापी भिक्षाटन अभियान की शुरुआत की. इस अभियान का उद्देश्य उच्च शिक्षा के विकल्प बढ़ाना और युवाओं को बिहार से बाहर पढ़ने की विवशता से मुक्त करना है. अभियान की शुरुआत भागलपुर में हुई, जहाँ बड़ी संख्या में शिक्षाविद्, प्राध्यापक और समाजसेवी उपस्थित रहे. इस अवसर पर ई. अंशु सिंह ने कहा कि यह केवल विश्वविद्यालय (university) खोलने की पहल नहीं है, बल्कि शिक्षा के लिए एक जन आंदोलन की शुरुआत है.

Read More

चाय की ख़ुशबू और यादों की परतें

चाय की ख़ुशबू संग जब यादों की परतें खुलती हैं,
तो ज़िंदगी में खोया-पाया सब सामने आ खड़ा होता है।दिल अक्सर सोचता है — काश! जो चाहा था, वही मिल जाता… या ज़िंदगी एक और मौका देती।”

Read More

प्रेरणा की स्वामिनी

यह कविता वेदना को संबोधित करते हुए लिखी गई है। कवि पूछता है कि क्यों हृदय थका हुआ और मन उद्विग्न है, क्यों विरह की बदली आँसुओं से भरी रहती है और क्यों उसे आकाश का कोई कोना भी नसीब नहीं होता।

वह वेदना को प्रेरणा की देवी मानकर कहता है कि सभी लोग तुम्हें आधुनिक मीरा कहते हैं—क्या तुम्हें भी विषपान करना पड़ा? कवि चाहता है कि जैसे गणपति प्रथम पूज्य हैं, वैसे ही वह वेदना को पूज्य मानकर आराधना करे, क्योंकि काव्य-जगत में वही उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा है।

Read More
भगवान गणेश की पीड़ा

भगवान गणेश की पीड़ा

ग्यारह दिनों तक मेरे भक्त मेरे दर्शन को तरसते रहे और मैं उनके प्रेम से अभिभूत था। परंतु विसर्जन के दिन जब बारह घंटों तक जल में खड़ा रहा, तब मैंने सच्चाई देखी।
मंडपों में लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे, बहसबाजी कर रहे थे, आगे बढ़ने के लिए एक-दूसरे को गिरा रहे थे। सेवक भी अपना रोब दिखा रहे थे।
मैंने सोचा—पंडाल में नहीं तो क्यों न खुले आसमान और समुद्र की लहरों के बीच सबको समान रूप से दर्शन दूँ। वहाँ न कोई कतार, न कोई वीआईपी, न कोई भेदभाव। लेकिन… मेरे भक्तों ने वहीं भी मुझे याद दिला दिया कि इंसान ने भगवान को भी अपने बनाए हुए अमीर-गरीब और ऊँच-नीच के नियमों में बाँध दिया है।

मैं तो वही एकदंत गजानन हूँ—चाहे लालबाग में विराजमान रहूँ या किसी छोटे पंडाल में, या फिर गिरगांव चौपाटी की लहरों में।मेरे लिए सिर्फ एक ही चीज़ महत्वपूर्ण है—मन से की गई भक्ति। बाकी सब इंसानी दिखावा है।”**

Read More

इंतज़ार करता आँगन

चार बेटे होने के बावजूद, उस बुज़ुर्ग दंपत्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव पर अकेलापन ही नसीब हुआ। सबने अपना-अपना जीवन चुन लिया, लेकिन अपने पीछे छोड़ गए वे माँ-बाप, जिनकी आँखें अब भी दरवाज़े की ओर टिकी रहती हैं। दादा-दादी अब पोतों की कहानियों और संस्कारों की बातें नहीं कर सकते, क्योंकि वे अब आसपास ही नहीं हैं।

घर की चिंता, इज़्ज़त और नाम की रक्षा अब किसे करनी है — ये सवाल दीवारों से टकराकर लौट आते हैं। माँ-बाप अब खुद को विरह की आग में झोंकने को तैयार हैं, क्योंकि बेटा अब बड़ा हो चुका है, पढ़-लिखकर देश से दूर जा चुका है, अपनी ज़िंदगी बनाने।

Read More

“मौन दरिया, बोलती रात”

यह कविता एक गहरे आत्ममंथन का चित्रण है, जिसमें कवि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जद्दोजहद से गुजर रहा है। वह सोचता है कि आखिर क्या कहे, किससे कहे और कितना कहे, क्योंकि कहने की भाषा तक मौन हो चुकी है। जीवन में ऐसा सन्नाटा है जहाँ शरीर के अंग सुन्न पड़ चुके हैं और चारों ओर उदासीनता छाई है। कवि प्रश्न उठाता है कि किसके पास कितना “पानी” बचा है और किसे उसकी परवाह है। हर कोई अपनी ही धुन में, अपने ही राग में व्यस्त है। जीवन बस एक बहती हुई धारा की तरह है, जो मौन रहते हुए भी अपनी कहानी कहती जाती है।
दरिया का सन्नाटा भी मानो संदेश देता है कि कहीं ठहरना मत, आगे बढ़ते रहना। इस अंतर्द्वंद्व में कवि सोचता है कि दरिया से भी आखिर क्या कहा जाए, क्योंकि यहाँ तो भाषा भी मौन है और कोई किसी का नहीं है

Read More

टूटते ख्वाबों की ग़ज़ल

गहन भावनाओं और रात के सन्नाटे के माध्यम से जीवन की नाजुकताओं और बेचैनियों को बयान करती है। लेखक की नींद में खलल डालने वाली घटनाओं के माध्यम से यह व्यक्त किया गया है कि किस तरह अचानक आने वाली परिस्थितियाँ हमारी मानसिक शांति और हौसलों पर असर डालती हैं। रात भर दिल और चाँद दोनों रोते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं का मिश्रण प्रस्तुत करता है। “इत्र सी सुगंध” और “तितलियों के पंखों पर रंग” जैसी छवियाँ जीवन की सुंदरता और नाजुकता को दर्शाती हैं, 

Read More
प्रेरणादायक कहानियां | अनसुने हीरो |

अनसुने हीरो को पहचान दिलाने की पहल

हम डिजिटल मीडिया की ताकत का उपयोग करते हुए प्रेरणादायक व्यक्तियों, संस्थाओं और विचारों की कहानियों को दुनिया तक पहुंचाते हैं. हमारा उद्देश्य केवल कहानियां साझा करना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव की एक नई लहर शुरू करना है.

हम विशेष रूप से उन अनसुने हीरो को सामने लाना चाहते हैं, जो बिना किसी पहचान या प्रचार के जमीनी स्तर पर लगातार काम कर रहे हैं. ये वही लोग हैं जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया अक्सर नजरअंदाज कर देती है, लेकिन असल बदलाव की नींव यही रखते हैं.

Read More

गीता उठा

क्यों रंगहीन हो जीवन तेरा, देखोयह बनफूल फिर से महक उठा। पियुष पी कर हो रहे जो उन्मत्त तब,विषधर की कल्पना से मैं जी उठा। रजत-कंचन ही है, चमकते सोच मत,आग में यूँ ती नहीं, वो जल उठा। अधर्म की जब-जब हो विजय,कर सामना तू धर्म का, धनुष उठा। क्यों दीन-हीन यूँ बन बैठे हो,जरा…

Read More