वो गाँव की कच्ची सड़क…
गाँव के बदलते स्वरूप और उसमें आने वाले शहरीकरण की भावनात्मक तस्वीर पेश करती है। कच्ची सड़कें अब काली, चौड़ी और बदल चुकी हैं, दोनों तरफ हरियाली से लहलहाते खेत अब दुकानों और व्यावसायिक स्थलों में बदल गए हैं। गाँव के लोग और उनकी सरल जीवनशैली धीरे-धीरे शहरी अंदाज़ और मुखौटे में बदल रही है। सुनार की जगह ज्वैलर्स, भड़भूजे और चने की जगह पॉपकॉर्न जैसी चीजें गाँव में जगह लेने लगी हैं। जबकि यह विकास और सुविधा का प्रतीक है, कवि अपने पुराने प्यार और ग्रामीण सादगी को याद करता है और मन में कचोट अनुभव करता है।
माँ का स्वरूप
माँ के दिव्य स्वरूप और मातृत्व, शक्ति, और ममता की अनुभूति का सुंदर चित्रण करती है। इसमें कवि माँ को आकाश सा विशाल हृदय और धरती का धीरज रखने वाली मानते हैं, जो बिना मांगे सब देती हैं और हर समय अपने भक्तों के साथ रहती हैं। कवि माँ से सुख-दुख में साथ रहने, हर सांस में उनका आशीर्वाद पाने और जीवन में उनके दर्शन करने की प्रार्थना करता है। यह कविता भक्ति, श्रद्धा और आत्मीय स्नेह का प्रतीक है, जो माँ की महिमा और उसके संरक्षण की भावना को उजागर करती है।
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खुद को निहारना भूल गई वो..
कविता महिलाओं के अक्सर अनदेखे संघर्षों को उजागर करती है, जो हर रस्म, हर बंधन और त्यौहार निभाती हैं, फिर भी खुद की खुशियों और अपनी देखभाल के लिए समय नहीं निकाल पातीं। सुबह की भागदौड़, बच्चों को तैयार करना, टिफ़िन बनाना और घर के काम निपटाना—इन सब में वह अक्सर अपने आप को आइने में देखना भूल जाती हैं। पति, सास-ससुर और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालते हुए हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान देती हैं, पर अपने लिए समय नहीं निकाल पातीं। बिंदी, पायल, झुमके और पल्लू संवारना—सब पीछे रह जाता है। बीमार होने पर भी उन्हें ताने और कई मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह कविता महिलाओं की अद्भुत सहनशीलता, उनके कर्तव्यों के प्रति समर्पण और रोज़मर्रा के जीवन में किए जाने वाले भावनात्मक परिश्रम को दर्शाती है, जो अक्सर अनदेखा रह जाता है।
माँ दुर्गा का आगमन
माँ दुर्गा के आगमन और नवरात्रि के उत्सव का सुंदर चित्रण करती है। कवि ने माँ के नौ रूपों के वास, भक्ति और श्रद्धा के भाव, तथा उनके दुष्टों के नाश करने वाले रूप का वर्णन किया है। भक्त अपनी विपत्तियों और संकटों में माँ के सामने आता है, उनका उद्धार माँ से आशा करता है। माँ का रूप लाल चुनर, मुकुट और त्रिशूल के साथ दिव्य और आकर्षक दिखाई देता है, और उनकी ममता और करुणा हर भूल और त्रुटि को क्षमा करने वाली प्रतीत होती है। भक्तों द्वारा हलवा-पूरी और चना जैसे भोग अर्पित किए जाते हैं, और वे माँ से आशीर्वाद की कामना करते हैं। पूरी कविता में भक्ति, श्रद्धा और उत्सव का वातावरण स्पष्ट है, जो संसार को माँ के प्रति प्रेम और सम्मान से मोहित करता है।
तन भादों, मन सावन
कविता में भावनाओं का सुंदर चित्रण है। यह उन अनुभवों और एहसासों की गहनता को व्यक्त करती है जो प्रेम और मिलन से उत्पन्न होते हैं। कवि अपने प्रिय के नेह में भीगकर अपने तन और मन में सावन का अहसास महसूस करता है। उसकी नजरों में प्रिय का रूप पनीला और मोहक प्रतीत होता है, और हर अंग में प्रेम की ज्वाला फैल जाती है। हवाओं के बहने से तन और मन बहक उठते हैं, और मिलन और बिछड़ने के पल झूलों की तरह आते-जाते हैं। हवाओं के माध्यम से प्रिय के शरीर की अनुभूति से सागर का सौंदर्य और जलमयता मन में उतर जाती है। जब से प्रिय उसके जीवन में आए हैं, उसका तन और मन उनके प्यार का घर और आँगन बन गया है। उसके अंतरतम में प्रिय के बसने से तन मंदिर और मन पावन हो गया है। यह कविता प्रेम के गहन अनुभव, मिलन की तृष्णा और भावनाओं की पवित्रता को उजागर करती है
विदाई गीत
आज विदाई का वह क्षण है, और मैं यहाँ अकेला खड़ा हूँ, यह सोचते हुए कि क्या कहूँ और शब्दों का सही चयन कैसे करूँ। मेरी आँखें भर आती हैं जब मैं अपने विद्यालय में पहले दिन की यादों को याद करता हूँ—वो उत्साह, वो नर्वसनेस, और दोस्तों के साथ की छोटी-छोटी शरारतें, जैसे क्लास में बंक मारना या किसी का टिफ़िन चुपके से ले जाना। वे निश्चिन्त, हँसी-खुशी भरे पल, दोस्तों के साथ की मस्ती, टीचरों को चिढ़ाना, खेल के मैदान और प्रार्थना की ध्वनि—ये सभी यादें हमेशा मेरे दिल में रहेंगी।
घर…
मैंने अपना घर किसी ईंट-पत्थर की दीवारों पर नहीं, बल्कि एक मधुर, दर्दभरी और सुरीली तान पर बनाया है। यह महज़ चार दीवारें और एक छत नहीं, बल्कि ऐसा स्थान है जहाँ भोर से लेकर संध्या और संध्या से रात तक संगीत बहता है। यहाँ संवाद की स्वतंत्रता है, त्याग और समर्पण का अहसास है, और रिश्तों के मौन बंधन भी। इस घर में पंछियों की चहचहाहट, पेड़ों की हरियाली, तितलियों के रंग और मिट्टी की गंध बसी है। यहाँ प्राणवायु संचार करती है और नादब्रह्म विचरता है। यह रंगों और सुगंधों से भरा, मिट्टी और खुले आसमान से जुड़ा एक निरामय संसार है।
ये कैसी भोर..
यह कैसी भोर है जहाँ सूरज की तपिश बढ़ रही है लेकिन शीतलता कहीं नहीं है। फूल खिले हैं पर उनमें महक नहीं, हवा बह रही है लेकिन उसमें सुकून नहीं। चारों ओर आपदाएँ बढ़ रही हैं और कवि का मन व्यथित है। उत्तराखंड की तबाही में असंख्य लोग अपने प्रियजनों को खो चुके हैं।
समय अभी भी है—हमें सँभलना होगा। हिमालय के साथ प्रयोग और परमाणु अत्याचार रोकना होगा, वरना यह विनाशकारी रास्ता भयानक परिणाम देगा। प्रकृति से छेड़छाड़ करने पर ज्वालामुखी फूटेंगे, भूकंप और सुनामी आएँगे और जीवन झुलस जाएगा। प्रकृति किसी की संपत्ति नहीं है, इस पर राजनीति करना आत्मघाती है। जब कुदरत का न्याय चलता है तब किसी की वकालत काम नहीं आती। मनुष्य को अपने स्वार्थ छोड़कर प्रकृति के साथ संतुलन बनाना ही होगा, नहीं तो भोर भी अँधियारी लगने लगेगी।
नई सोच
आज की युवा पीढ़ी पर अक्सर आलोचना की जाती है—संस्कारहीन, आधुनिक जीवनशैली में खोई, और नशे-जुए जैसी बुरी आदतों में फंसी। लेकिन एक बस यात्रा में 25 वर्षीय युवक से हुई बातचीत ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया। युवक की ईमानदारी, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता देखकर पता चला कि नई पीढ़ी में भी सम्मान, समझ और संस्कार गहराई से भरे हैं। यह अनुभव न केवल प्रेरणादायक था, बल्कि सोचने पर मजबूर करने वाला भी।
