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अंतर्राष्ट्रीय पेन फेस्टिवल पुणे उद्घाटन समारोह"

पेन, स्याही और शब्दों का महाकुंभ

बचपन से ही पेन और स्याही हर इंसान की जिंदगी का अहम हिस्सा रहे हैं। भावनाएं हों या विचार, जानकारी हो या कल्पना शब्दों के जरिए खुद को अभिव्यक्त करने का माध्यम यही लेखन उपकरण रहे हैं। इसी लेखन संस्कृति का उत्सव मनाने जा रहा है पुणे, जहां 10 और 11 जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय पेन फेस्टिवल का आयोजन किया जा रहा है।

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चुप्पी में दर्ज एक स्त्री

स्त्री के उस अनकहे इतिहास की साक्षी है, जिसे वह नीले निशानों, झुकी आँखों और मौन सहमति के बीच ढोती रहती है। पिता से पति तक, देह से धर्म तक, वह हर भूमिका निभाती हुई अपनी इच्छाओं को अवर्जित कर देती है। अहिल्या, द्रौपदी, उर्मिला और सीता की तरह वह सदियों से अग्नि-परीक्षाओं में झोंकी जाती है फिर भी सृजन करती है, सहती है और अंत तक एक अभेद रहस्य बनी रहती है

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क्रान्ति

ह कविता तात्कालिक सुख और अधैर्य से भरी दुनिया के बीच धैर्य, साधना और विचार की क्रान्ति का घोष है। रिश्तों को मौसमी फल-फूल नहीं, बल्कि चिनार और आम जैसे दीर्घजीवी वृक्ष मानते हुए यह रचना बताती है कि सच्चा परिवर्तन समय, सतत प्रयास और विश्वास से जन्म लेता है और वही विचारों की वास्तविक क्रान्ति है।

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मैं तुम्हें सोचता रहता हूँ…

यह कहानी प्रतीक्षा के उस नाज़ुक क्षण की दास्तान है, जहाँ प्रेम शब्दों से पहले मौन में पलता है। किताबों, कॉफी-हाउस और बारिश में भीगे स्वीकार के बीच, एक स्त्री वर्षों तक एक वाक्य के सहारे जीती रहती है—“I am well thinking of you always.” यह केवल स्वीकार नहीं, बल्कि संकोच, भय और आत्म-संयम को पार कर प्रेम को आवाज़ देने की कथा है।

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डॉ.अमरेंद्र की काव्य पुस्तक विशाखा विमोचित

स्नेह, सम्मान और साहित्य के त्रिवेणी संगम में सम्पन्न हुआ ‘विशाखा’ का विमोचन केवल एक पुस्तक-प्रस्तुति नहीं, बल्कि संवेदनाओं का उत्सव था। बिना किसी भव्य मंच के, आत्मीय वातावरण में शब्दों ने आत्मा से संवाद किया और बिहार की दो बेटियों के संकल्प ने ‘मिलकर प्रेरित करें बिहार’ को जीवंत अर्थ दे दिया।

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हर जन्म की प्यास

मीठी नदी के आत्मस्वर में कही गई एक भावपूर्ण यात्रा है. जहाँ स्वप्नों की मिठास लेकर वह उदधि से मिलन को निकल पड़ती है। खारापन स्वीकार्य है, क्योंकि हर जन्म की प्यास वहीं शान्त होती है। वर्षों की भटकन, नयनों में भरा जल, और नमन से भरा समर्पण सब मिलकर प्रेम, प्रतीक्षा और स्वीकार की एक शान्त, उजली कथा रचते हैं।

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बंधन प्यार का

आज मंगल कार्यालय में शहनाई के सुमधुर स्वर गूंज रहे थे. मेहमानों का आना शुरू हो चुका था. शादी में रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों को निमंत्रण दिया गया था.रात को विवाह संपन्न हुआ. सभी मेहमान भोजन करके विदा हो गए. अब घर के सदस्य आपस में बातें कर रहे थे.

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कल्पना

“परिस्थितियाँ कर्माधीन होती हैं, पर खुशियाँ इंसान के साहस और स्वीकार भाव से जन्म लेती हैं। होली के रंगों ने कल्पना की सूनी ज़िंदगी में फिर से प्रेम और उम्मीद के रंग भर दिए।”

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देश की रक्षा में भी तैनात हैं अनेक बेजुबान जानवर

इस जगत में बेज़ुबान पशु-पक्षी हमारे लिए भोजन (दूध, मांस, अंडे), कृषि (खेत जोतना), परिवहन (बोझ ढोना), वस्त्र (ऊन, चमड़ा), दवा (अनुसंधान) और भावनात्मक सहारे (पालतू जानवर) जैसे अनेक रूपों में अत्यंत उपयोगी हैं। वे न केवल हमारे जीवन के हर पहलू में योगदान देते हैं, बल्कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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लहरों के बीच ठहरा मन

प्रकृति की गोद में बैठकर वह खुद को सुनना चाहती है .सूरज की किरणों, बादलों के आलिंगन, समुद्र की लहरों और पक्षियों की चहचहाहट के बीच। वर्षों के भीतर जमा कोलाहल को पीछे छोड़ते हुए, आत्ममंथन की इस शांत यात्रा में अब एक साधारण-सी चाय की प्याली भी उसे अमृत-सी प्रतीत होने लगी है।

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