साहित्य
शून्य सा वज़ूद रखा कीजिए
एक करोड़पति इंसान, जो केवल अपनी कमाई में बढ़ते शून्य और दिखावे की भीड़ में संतुष्टि ढूंढता है, वास्तव में भीतर से सबसे दरिद्र हो सकता है। अमीरी केवल धन से नहीं, बल्कि विनम्रता, आत्म-संयम और नि:स्वार्थ सेवा से मापी जाती है। जो व्यक्ति अपने सामान्य कार्यों को करने में शर्म करता है और केवल दिखावे के लिए दान करता है, उसका अहंकार अंततः उसे अकेला छोड़ देता है। शून्य बनकर रहना सीखिए – जो किसी के साथ जुड़ जाए तो उसकी कीमत बढ़ा देता है, पर स्वयं का कोई घमंड नहीं रखता।
रामलीला: एक प्रतीक्षा, एक परंपरा, एक अपनापन
साल 1977 की यह रामलीला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि महिदपुर रोड की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान थी। रंग-बिरंगे पर्दों, अनुशासनपूर्ण व्यवस्था और जीवंत पात्रों वाली यह रामलीला आज भी स्मृतियों में जीवित है, जब लोग दोपहर में ही रात की सीट बुक करने चले जाते थे, और हनुमानजी का प्रसाद पूंछ से मिलता था।
वे पुरानी सी प्रेमिकाएं…
यह कविता उन पुरानी प्रेमिकाओं और पत्नियों को समर्पित है जिन्हें पढ़ना-लिखना भले न आता हो, पर जिन्होंने प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियाँ रचीं — कभी गीली मिट्टी में पैर के अंगूठे से प्रेम-पत्र उकेरकर, तो कभी पलकों के इशारे से मन की बात कहकर। उनका प्रेम किताबों में नहीं, ज़मीन पर लिखा जाता था। आज की चिकनी टाइल्स और मार्बल की ज़मीन पर वो प्रेम-पत्र कहीं दबकर खो चुके हैं। इस निश्छल, मौन, पर गहरे प्रेम को समझने के लिए शायद हमें टाइम मशीन में लौटकर जाना होगा।
“देह, निर्णय और दरारें”
पितृसत्ता केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक गहराई से जड़ें जमाई मानसिक संरचना है जो पुरुष को सत्ता और स्त्री को ‘अन्य’ मानकर उसके श्रम, निर्णय और देह पर नियंत्रण स्थापित करती है। यह लेख पितृसत्ता की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और आधुनिक सामाजिक परतों को खोलते हुए यह सवाल उठाता है कि आखिर हम ‘मनुष्य’ से ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ में कब और कैसे बंट गए?
प्रभा का अस्तित्व
प्रभा बचपन से ही संकोची स्वभाव की थी, त्याग और समर्पण उसकी परवरिश का हिस्सा रहे। संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी प्रभा ने हमेशा दूसरों की इच्छाओं को प्राथमिकता दी, लेकिन अंततः अपनी खोई पहचान को पुनः प्राप्त किया। एक साधारण स्त्री से विद्यालय संचालिका बनने तक का उसका सफर आत्मबल, आत्म-साक्षात्कार और स्वाभिमान की मिसाल बन गया।
हरीतिमा
हरीतिमा कविता में कवयित्री ने प्रकृति की सौंदर्यता और उसकी अद्भुत पुनरुत्थान शक्ति को दर्शाया है। अंधड़ में धराशायी हुए वृक्षों के अवशेषों पर फिर से नवपल्लव खिलते हैं, जीवन की जिजीविषा से भरा एक बैंजनी फूलों का कतार उग आता है। कविता यह संदेश देती है कि धरती बिना किसी लेन-देन के अपार स्नेह और जीवन देती है। हरीतिमा का यह निस्वार्थ उपहार कवयित्री के अंतर्मन में कवि के उस अमर वाक्य को बार-बार गूंजने पर विवश करता है – “आ: धरती कितना देती है!”
अंदर की चीख़ें: मुस्कुराते चेहरे के पीछे का तूफ़ान
यह कविता एक ऐसी संवेदनशील आत्मा की आवाज़ है जो दुनियावी दिखावे और भीड़ की नजरों से छुपे अपने दर्द, संघर्ष और अंतर्मन की झंझावतों को बयां करती है। वह खुद को रोज़ झुकाते हुए भी टूटी नहीं है, अपने अंदर के तूफ़ान से रोज़ लड़ती है, लेकिन उसकी चुप्पी, उसका हौसला, उसकी मोहब्बत और उसकी संभावनाएं—किसी की नज़र में नहीं आतीं। यह एक ऐसा आईना है जिसमें हर वो व्यक्ति खुद को देख सकता है जिसने कभी खुद को भीड़ में खोया पाया हो।
उखड़ने के बाद भी ना हारा… देखिए इस पीपल की जिद!
जड़ों से उखाड़े जाने के बाद भी मुस्कुराना कैसे संभव है, यह सांवेर रोड की पहाड़ी पर लगाए गए पीपल के तने से सीखा जा सकता है। बिना शाखाओं के रहकर भी उसने हरियाली का संदेश दिया है। नगर निगम की यह पहल न सिर्फ पर्यावरण बचाने की मिसाल है, बल्कि पेड़ ट्रांसप्लांटेशन की एक प्रेरणादायक कहानी भी है।
