तुलसीदास: एक ताने ने जिसे बना दिया युगों का संत

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना में जब भी भक्ति और आध्यात्मिक साहित्य की बात होती है, गोस्वामी तुलसीदास का नाम श्रद्धा और गौरव के साथ लिया जाता है. वे न केवल एक संत, एक कवि और एक भक्त थे, बल्कि आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे युगपुरुष भी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं से भारतीय समाज की आत्मा को गहराई से स्पर्श किया.
लगभग 500 वर्ष पूर्व भारत में मुगल शासन की नींव पड़ चुकी थी. इसी काल में उत्तरप्रदेश के बांदा ज़िले के ग्राम राजापुर में रामबोला नामक बालक का जन्म हुआ.

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मासूम मुस्कान और गहरे रहस्यमयी नयनों वाली साधारण भारतीय युवती

कसक

यह कविता एक ऐसी साधारण लेकिन रहस्यमयी स्त्री के सौंदर्य और भावनाओं का चित्रण करती है, जिसकी मासूम मुस्कान और गहरे नयन किसी वेद की तरह गूढ़ प्रतीत होते हैं। बिना श्रृंगार की सादगी, उसके व्यक्तित्व को और भी आकर्षक बनाती है। हर पंक्ति में प्रेम, रहस्य और भावनाओं की गहराई झलकती है।

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अहसासों के कतरन…

हम अपने आप में बस एक पानी की बूँद जैसे हैं। कभी मिट्टी पर गिरकर उसमें समा जाते हैं, तो कभी किसी पत्ते पर टिककर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। और जब लहरों से मिलते हैं, तो खुद सागर का रूप ले लेते हैं। हमारी पहचान इस पर नहीं है कि हम कौन हैं, बल्कि इस पर है कि हम किससे जुड़ते हैं।

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किस विध लूँ तेरी थाह

यह कविता एक गहरी, रहस्यपूर्ण और रूमानी अभिव्यक्ति है — प्रेम में डूबे एक हृदय की उस छटपटाहट और जिज्ञासा की, जो अपने प्रिय की भावनाओं, मौन संकेतों और अस्तित्व को पूरी तरह समझना चाहता है। शीर्ष पंक्ति “किस विध लूँ तेरी थाह प्रिय” पूरे काव्य का केंद्रीय भाव है — यह प्रश्न नहीं, एक आकुल जिज्ञासा है, एक समर्पण है।

कविता में प्रिय को एक ऐसी नदी के रूप में देखा गया है, जो सतह पर तो लहराती, मुस्कराती, बलखाती दिखती है, लेकिन भीतर कहीं गहराई में कई सदियों से प्यासेपन की पीड़ा को संजोए हुए है। वह प्रिय किसी दरिया से मिलन नहीं चाहता, फिर भी एक अनकहा प्रवाह है, जो उसे बहाए लिए जाता है — यही वह विरोधाभास है जिसे कवि समझना चाहता है।

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हौसले की लौ…

यह कविता आत्मबल, साहस और जीवन संघर्षों के बावजूद आगे बढ़ते रहने की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। इसमें कवि अपने जीवन की यात्रा को एक पर्वतारोहण की तरह प्रस्तुत करता है, जहां रास्ता कठिन है, पर मंज़िल की चाह अडिग है।

प्रारंभिक पंक्तियाँ प्रेरणादायक हैं — आँधियों और तूफानों को भी मात देने वाले उस ‘हौसले के दिए’ की बात होती है, जो अंधेरे में भी मार्ग दिखाता है। इसके बाद कविता सपनों की उड़ान की बात करती है, और बताती है कि थकना, रुकना या पीछे हटना विकल्प नहीं है।

यह एक ऐसा जोश भरा गीत है, जो संघर्षों को गीतों में पिरोकर उन्हें प्रेरणा में बदल देता है। वक्त ने चाहे कितनी भी सख्ती दिखाई हो, लेकिन वक्त ही नई रोशनी भी लाएगा — इस उम्मीद को कवि ने ‘नूर’ और ‘दीप’ जैसे प्रतीकों से दर्शाया है।

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माँ जैसी नहीं हूं मैं…

यह कविता एक आत्मस्वीकृति है — एक बेटी की अपनी माँ के प्रति संवेदनाओं, निरीक्षणों और अनुभवों की गहराई से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति। वह कहती है कि वह अपनी माँ की खामोशी पढ़ लिया करती थी, माँ के संघर्षों और त्याग की साक्षी रही है। माँ की आँखों में छिपे दर्द, जीवन की कठोर सच्चाइयों से संघर्ष, और अपनी इच्छाओं को निस्वार्थ भाव से दबा देने का दृश्य उसने बार-बार देखा।

वह माँ की हर वह चुप्पी पहचानती थी, जिसे दुनिया अनदेखा कर देती है। माँ के आँचल से आँसू पोछने से लेकर, चाँदनी रातों में अपने दुखों से बात करने तक की हर एक लम्हा, बेटी के मन में गहरे बैठ गया।

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साँझ..

उम्र की इस साँझ में, जब तुम स्वयं से मिले — यह कविता जीवन की उस अवस्था की बात करती है जहाँ इंसान अपने अनुभवों और अधूरी इच्छाओं की परछाइयों से रूबरू होता है। मन की चुप्पी में जब आत्मा खुद से सवाल करती है — ‘क्यों इतने भ्रम में ढले?’ — तो यह जीवन की उन अधूरी आकांक्षाओं और खोई हुई संभावनाओं की ओर इशारा करता है जो समय के साथ रह गईं।

कविता का केन्द्रीय भाव यह है कि जो हम जीवन भर बाहर खोजते हैं — जैसे संतोष, प्रेम, आत्मिक शांति — वो हमारे ही भीतर है, ठीक उसी तरह जैसे मृग के भीतर ही कस्तूरी होती है। लेकिन मन फिर भी किसी सहारे, किसी उम्मीद की डोर से बंधा रहता है।

‘हर किसी की राह में एक अधूरा काश है’ — यह पंक्ति जीवन की सार्वभौमिक सच्चाई को व्यक्त करती है कि हर इंसान के मन में कुछ अधूरी इच्छाएँ रह जाती हैं। और शायद वही अधूरापन हमें इंसान बनाता है, हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

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वो घर मेरा

वो मेरा पुराना घर… जहां न बेफिक्री की कोई सीमा थी, न रिश्तों में कोई दीवार। सालों बाद लौटने पर जैसे समय थम गया। हर कोना, हर दीवार, और बंद पड़ी घड़ी मानो कुछ कहने को बेताब थी। वहां अब भी माँ की पुकार गूंजती है, पर उस चूल्हे की आग बुझ चुकी है। सब कुछ वहीं था, लेकिन जीवन का शोर-गुल, हँसी और मिल बैठने की वो आत्मीयता कहीं खो गई थी। आज सबके अपने कमरे हैं, लेकिन दिलों की दूरी बढ़ गई है। कविता एक भावुक पुकार है – लौट चलें उस पुराने आँगन की ओर, जहाँ त्योहार सिर्फ रस्म नहीं, रिश्तों का उत्सव होते थे।”

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सर्टिफिकेट

सिर्फ़ शादी होना सर्टिफिकेट नहीं होता, माँ!” — अनीता की ये बात एक सशक्त सामाजिक सवाल खड़ा करती है: क्या एक स्त्री की स्वतंत्रता और निर्णय का मापदंड सिर्फ विवाह होना चाहिए?

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सिस्टम, सिस्टमैटिकली बच निकला..

तो ख़बर ये है, मित्र… कि सिस्टम हमेशा की तरह सिस्टमैटिकली अपने बाल भी बाँका किए बिना फिर से बच निकला है, जैसे उसे संविधान की किसी फुटनोट में कोई स्पेशल छूट मिली हो.
एक बार फिर, एक स्कूल की छत ढह गई और हमेशा की तरह, मासूम बच्चे ढहती दीवारों के नीचे दब गए. कुछ घायल हुए, कुछ अनंत यात्रा पर निकल लिए…
आप कहेंगे, ऐसी तो और भी इमारतें ध्वस्त हुई हैं भूस्खलन हुआ, बाढ़ आई, करंट लगने से भी अच्छे-खासे जान और माल की हानि हुई फिर आप इस एक सरकारी इमारत के पीछे क्यों पड़े हैं?
बस इसीलिए कि ये सरकारी थी.
सरकार इधर खुद की जोड़-तोड़ में लगी है. एक बार फिर आपने उसे व्यस्त कर दिया ङ्गहमें दुःख हैफ की बजरी, ङ्गदोषियों को बख्शा नहीं जाएगाफ के सीमेंट और सरकारी ब्रांड के मगरमच्छी आँसुओं का पानी मिलाकर एक गाढ़ा लेपन तैयार हुआ है जिससे की जाएगी लीपापोती.

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