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सुनो पलाश …

हर साल फरवरी में पलाश जब अनंत से उतरकर मेरे छत की मुंडेर तक खिल जाता था, तब कुछ भीतर गुनगुनाने लगता था। ज्वालामुखी से दहकते फूलों की गरमी मेरी उँगलियों तक दौड़ जाती थी। किताबें बेअसर हो जाती थीं, मन मुंडेर पर टिक जाता था, और अम्मा की डांट भी उस खींचाव को रोक नहीं पाती थी। तब नीले स्कर्ट की सुनहरी किनारी घुटनों तक फहराती थी और गालों पर सिंदूरी रंग अपनी पहली होली खेलने लगता था। साल दर साल फरवरी आती रही, लेकिन आज कपोल रक्तहीन हो गए, स्कर्ट बीते दिनों की बात बन गई, और अम्मा की डांट एक स्मृति। लेकिन मन अब भी चाहता है कि पलाश लौटे, फिर एक बार मुंडेर तक झुके, फिर से होरी से पहले होली खेली जाए।

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एक प्याली चाय… और पीछे छुपा पूरा असम

“भारत की आत्मा अगर विविधता है, तो उसकी सांसों में जो सुगंध बसी है वह है चाय की खुशबू। हर सुबह की शुरुआत, हर शाम की थकान, दोस्तों की हंसी और दफ्तर की भागदौड़—इन सबके बीच कहीं न कहीं असम की मिट्टी और मेहनत की खुशबू घुली होती है। असम की ब्रह्मपुत्र घाटी की उर्वर मिट्टी और मेहनती मजदूरों की तपस्या से निकली हर चाय की चुस्की सिर्फ स्वाद नहीं, एक संस्कृति, संघर्ष और सम्मान की दास्तान सुनाती है।”

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पुराना बरगद का पेड़ 

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

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क्यूँ जिंदा है…

“क्यूँ ज़िंदा है ज़िंदगी जब ये सवाल करे,
उत्तर अपने सारे बस बवाल करे,
मीठे बोले लगते हो खारे,
ख्वाब सारे रह जाए अधूरे,
जो आंखों में आंसू भर भर आये —
उफ्फ! अब ना तो जिया जाए,
तब मन की गिरह खोल के सारी,
सिर्फ़ रब को याद करना।”

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खाने की पसंद-नापसंद: स्वाद से ज़्यादा मन का खेल

“मशरूम का स्वाद हो या मटन-फिश का, कई बार भोजन के प्रति हमारी पसंद-नापसंद सिर्फ स्वाद की बात नहीं होती। यह हमारी परवरिश, संस्कृति और बचपन की थाली का असर होता है। जब कभी आपसे कोई आग्रह करे कि ‘बस एक बार टेस्ट कर लो’, तो याद रखिए—हर स्वाद के पीछे एक स्मृति होती है। मशरूम को लेकर मन की दूरी, स्वाद कलिकाओं की नहीं, बल्कि गहरे संस्कारों और भावनाओं की कहानी है। खाने का चुनाव शरीर और आत्मा दोनों की सहमति से होता है।”

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इंदौर कंपोस्ट सिस्टम: खेतों से लंदन तक की गूंज

“जिन अंग्रेजों के ज्ञान को हम श्रेष्ठ मानते हैं, उन्हें जैविक खाद का ज्ञान बिहार और इंदौर के अनपढ़ किसानों ने दिया था। यही कारण है कि ‘इंदौर कंपोस्ट सिस्टम’ को वैश्विक पहचान मिली और गांधीजी स्वयं इसे समझने इंदौर आए। 1925 में अल्बर्ट हॉवर्ड ने इंदौर में कंपोस्ट खाद पर शोध कर पूरी दुनिया को प्राकृतिक खेती का संदेश दिया। सौ साल पहले भारतीय किसान पेड़ों की पत्तियों, गोबर और प्राकृतिक अवशेषों से जो खाद बनाते थे, वही आज भी मिट्टी की सेहत के लिए सबसे उपयोगी है। इंदौर नगर निगम ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने वार्डों में कंपोस्ट खाद प्लांट लगाकर आधुनिक नगरीय कृषि में नया अध्याय जोड़ा है।”

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जागरण को जी रही हूँ…

“जागरण को जी रही हूँ, याद को प्रहरी बनाकर… मैं अब दर्द को मुस्कुराकर आज़माना चाहती हूँ। भोर की आसावरी में चेतना के छंद लिखना, सरित की लहरों के साथ प्यास के अनुबंध रचना और अनमनी यामिनी को चाँद का झाँसा दिखाना… यही अब जीवन का नया संकल्प है। चार दिन की ज़िन्दगी को प्यार से सजाना, नफ़रत को मात देना और हर मुश्किल को आसान बनाना—बस यही है मेरी नई यात्रा का उद्देश्य।”

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खिड़की से झाँकती ज़िंदगी के दो रंग”

बदलते दृश्य, खिड़की से दृश्य, चिड़ियों का संसार, पहाड़ और धुंध, पोस्ट बॉक्स कहानी, किताबों की अहमियत, शहरी जीवन के दृश्य, सुबह की ताजगी, प्रकृति का सौंदर्य, व्यस्त जीवन के पल, विचारशील कविता, समकालीन अनुभूति, महिला दृष्टिकोण, बदलती संवेदनाएँ

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वरिष्ठ कवयित्री निवेदिता श्रीवास्तव ‘गार्गी’ को मिला विद्यावाचस्पति सम्मान

हरिद्वार में आयोजित भव्य कवि सम्मेलन में झारखंड की साहित्य साधिका को सम्मानित किया गया हरिद्वार, 12 जुलाई 2025 — साहित्यिक जगत के लिए यह गर्व का क्षण रहा जब झारखंड की वरिष्ठ कवयित्री निवेदिता श्रीवास्तव ‘गार्गी’ को विद्यावाचस्पति सम्मान से अलंकृत किया गया। यह सम्मान उन्हें हरिद्वार में आयोजित एक भव्य कवि सम्मेलन के…

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