नींद

नीलिमा शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली

नींद

रात भर नहीं आती,

सोच

जागती रहती है

पलक–पलक।

दिन की मशक्कत के बाद

देह तो थक जाती है,

पर मन

काम से

इस्तीफ़ा नहीं देता।

तकिये के नीचे

दबी रहती हैं

अनकही बातें,

जो अँधेरे में

और ऊँची आवाज़ में

बोलती हैं।

घड़ी की सुइयाँ

चलती नहीं,

सिर्फ़ याद दिलाती हैं

कि नींद भी

एक विलास है।

सुबह

आँखें खुलती हैं,

पर रात

अब भी

भीतर जाग रही होती है।

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