नींद

यह कविता अनिद्रा की उस गहरी अवस्था को चित्रित करती है, जहाँ शरीर थक चुका होता है लेकिन मन लगातार सक्रिय रहता है. रात भर जागती सोच, तकिये के नीचे दबी अनकही बातें और स्थिर घड़ी की सुइयाँ जीवन की थकान और मानसिक बोझ को प्रतीकात्मक रूप में सामने लाती हैं. सुबह होने पर भी रात का जागना भीतर बना रहना, आधुनिक मनुष्य की मानसिक बेचैनी को सशक्त रूप से व्यक्त करता है.

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मन बंजारा

मन जैसे किसी अनजानी खोज में निकल पड़ा है। अब उसे ठहराव अच्छा नहीं लगता. तपती रेत भी उसे सुकून देती है. गर्म हवाओं के थपेड़े तन को झुलसा देते हैं, पर मन फिर भी मुस्कुरा उठता है। कभी कहीं से आती करुण पुकार उसे रुला देती है, तो कभी बिना कारण हँसी में डूब जाता है। माथे की बिंदिया, हाथों की चुड़ियाँ, झूलती बालियाँ .सब जैसे जीवन की थकान को सहला जाती हैं. रंग-बिरंगे घाघरों के बीच मटमैले सपने पलते हैं, और जब रात उतरती है, तो चाँदनी सबको अपनी गोद में सुला देती है.

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टूटते ख्वाबों की ग़ज़ल

गहन भावनाओं और रात के सन्नाटे के माध्यम से जीवन की नाजुकताओं और बेचैनियों को बयान करती है। लेखक की नींद में खलल डालने वाली घटनाओं के माध्यम से यह व्यक्त किया गया है कि किस तरह अचानक आने वाली परिस्थितियाँ हमारी मानसिक शांति और हौसलों पर असर डालती हैं। रात भर दिल और चाँद दोनों रोते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं का मिश्रण प्रस्तुत करता है। “इत्र सी सुगंध” और “तितलियों के पंखों पर रंग” जैसी छवियाँ जीवन की सुंदरता और नाजुकता को दर्शाती हैं, 

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