जब चिड़िया चुग गई खेत !

वर्षा गर्ग, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई

आज करवाचौथ है, हो सके तो थोड़ा जल्दी आ जाइए।
पूजा के बाद आपके साथ ही खाना खाऊँगी।”
नेहा की बात सुनते ही मेरा मूड बिगड़ गया।

“तुमसे कितनी बार कहा है, इन ढकोसलों में मुझे शामिल मत किया करो। पूजा-पाठ, व्रत-उपवास किसी बात में मेरी ज़रा भी श्रद्धा नहीं है। अपने काम को ही पूजा मानता हूँ मैं।”

“अरे, पर ये तो आपकी लंबी उम्र…”
नेहा की पूरी बात सुने बगैर ही मैं लिफ़्ट में घुसते हुए बटन दबा चुका था। पीछे मुड़ते हुए ताना मारने से भी नहीं चूका
“दुनिया चाँद पर पहुँच चुकी है और तुम अब भी चाँद की पूजा पर अटकी हो?”

अस्सी की रफ़्तार से दौड़ती हुई गाड़ी के रियर-व्यू मिरर से पीछे छूटते दृश्यों के साथ ही पिछली बातें शिद्दत से याद आने लगीं। बिज़नेस में आज विनोद मित्रा यानी मेरा नाम टॉप में शुमार है, किंतु जीवन तो मानो मुट्ठी में पकड़ी रेत की तरह हाथों से फिसल गया।
बहुत जल्दी ऊँचाई पर पहुँचने की धुन ने न तो घर-परिवार से जुड़ने का मौका दिया, न ही अपनी भावनाएँ व्यक्त कर पाने का। बैंक खातों में बढ़ते शून्य, जीवन में इतना सूनापन भर देंगे समय रहते समझ ही नहीं पाया।

सिग्नल पर गाड़ी रुकते ही शीशे पर ठक-ठक हुई। एक बारह-तेरह साल की लड़की टोकरी में ढेरों वेणियाँ और गजरे लिए खड़ी थी।
“आज करवाचौथ है, अंकल। ले लीजिए, आंटी खूब खुश हो जाएँगी।”
उसकी बात सुनते ही हज़ारों बिच्छुओं ने मानो एक साथ डंक मार दिया।

नेहा यही तो कहती थी-हीरे-मोती नहीं, मुझे सिर्फ़ थोड़ा समय दे दो। अगर किसी दिन एक मोगरे का गजरा भी अपने हाथों से मेरे बालों में लगा दोगे, तो खुद को दुनिया की सबसे खुशनसीब स्त्री समझूँगी।

काश! समय रहते सब समझ आ जाता।

सिग्नल खुलते ही लड़की के हाथों सौ रुपये का नोट रखते हुए मैंने बिजली की तेजी से एक गजरा उठा लिया।
डैशबोर्ड पर रखी नेहा की तस्वीर के आगे गजरा रखते हुए आज मेरी आँखें भीग रही हैं… पता नहीं क्यों।

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