Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

अलविदा झामरी

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

न जाने क्यों, होता है ये ज़िंदगी के साथ
अचानक ये मन,
किसी के जाने के बाद…
करे फिर उसकी याद ….
.फिल्म छोटी सी बात का यह गीत…जिसे शब्द दिए थे योगेश ने, सुरों में पिरोया था.. सलिल चौधरी ने ..और स्वर दिया था मेरी सबसे प्रिय लता दीदी नेआज यूँ ही याद नहीं आया. यह गीत आज एक ऐसे जाने वाले की याद में मन के भीतर गूंज उठा, जो आया, गुमनामी में रहा और चुपचाप चला गया. उसके जाने के बाद उसकी छोटी-छोटी आदतें, उसकी मौजूदगी, उसका मौनसब कुछ याद आने लगा. लोग उसे ज़्यादा नहीं जानते थे. न यह कि वह कहां से आई थी, न यह कि उसके मां-बाप कौन थे. बस उसके रंग-रूप और अलग पहचान को देखकर लोगों ने उसे एक नाम दे दिया था झामरी.
झामरी कौन थी?
झामरी कोई इंसान नहीं थी.झामरी एक ट्रांसजेंडर डॉग थी. माताजी मंदिर के सामने ही उसका ठिकाना था. आम आवारा कुत्तों से एकदम अलगशांत, संकोची और गरिमामयी. उसे देखकर लगता था कि उसका बचपन कहीं अच्छे सलीके और प्यार में गुज़रा होगा. शायद कभी वह मर्सिडीज़ या किसी और आलीशान कार में घूमी होगी, शैम्पू से नहलाई गई होगी, समय पर डॉक्टर की जांच, गोलियां और ग्रूमिंग एक्सेसरीज़ उसकी दिनचर्या का हिस्सा रही होंगी. लेकिन नियति का खेल देखिए..किसी मोड़ पर उसे अकेला छोड़ दिया गया. नगर पालिका की गाड़ी आई और उसे उठाकर महिदपुर रोड जैसे दूरदराज़ इलाके में छोड़ दिया गया. ऐशो आराम में पली झामरी के लिए यह दुनिया बिल्कुल नई और कठोर थी. शर्मीले स्वभाव के कारण वह दूसरे आवारा कुत्तों से अपनी रक्षा नहीं कर पाती थी. शायद इसी डर और असहायता ने उसे माताजी मंदिर की शरण में ला खड़ा किया.

झामरी का ओरीजनल फोटो


अलग पहचान, अलग संघर्ष

झामरी दिखने में सुंदर थी, पर ट्रांसजेंडर होने के कारण अन्य कुत्तों के बीच उसे लेकर कोई झगड़ा नहीं हुआ. धीरे-धीरे उसका जीवन एक पटरी पर आ गया. हालांकि परिस्थितियों ने उसे कमजोर कर दिया था. उसका पहले वाला सौंदर्य, उसका चमकता हुआ रूप अब धुंधला पड़ चुका था, फिर भी वह सबसे अलग दिखती थी. उसका अंदाज़, उसकी चाल, उसकी आंखों की मासूमियतसब उसे विशिष्ट बनाते थे. गोल्डन रिट्रीवर की औसत उम्र 10 से 15 वर्ष मानी जाती है, लेकिन झामरी शायद 78 साल की उम्र में ही बूढ़ी हो गई थी. उसका जाना असामयिक ही कहा जाएगा.

अनिल परमार: एक मसीहा
जब झामरी दाना-पानी और सुरक्षित ठिकाने के लिए भटक रही थी, तभी उसकी ज़िंदगी में एक इंसान आयासमाजसेवी अनिल परमार. उनका अपना टी-स्टॉल है, इसलिए दूध की कभी कमी नहीं रहती. बाहर का खाना झामरी को रास नहीं आता था, लेकिन दूध और बिस्किट..बस वही उसका संसार था. अनिल परमार दिन में दो बार उसे दूध पिलाते, बिस्किट खिलाते. उनके अलावा झामरी किसी का दिया खाना न देखती थी, न छूती थी.धीरे-धीरे वह सबकी चहेती बन गई. वह लावारिस थी, पर लावारिसों की तरह जी नहीं और न ही गई.
सम्मान के साथ विदाई
झामरी के साथ बच्चे खूब मस्ती करते थे. कई बार बच्चे उसे मार भी देते थे, लेकिन वह बिना किसी प्रतिकार के चुपचाप आंखें बंद कर लेती थी. उसमें कोई आक्रोश नहीं थाबस सहनशीलता थी.
आज उसके जाने के बाद पूरी गली सूनी लगती है. उसकी मौजूदगी अब यादों में बदल चुकी है. कौन थी वह? क्या थी? क्यों थी? इन सवालों के बीच बस एक सच्चाई है. झामरी ने बिना बोले भी बहुत कुछ सिखाया. उसकी मृत्यु के बाद उसे सम्मान के साथ दफनाया गया. यह साबित करता है कि इंसानियत अब भी पूरी तरह मरी नहीं है.
झामरी और उसकी नस्ल
झामरी एक गोल्डन रिट्रीवर थी..एक ऐसी नस्ल जो अपने शांत, मधुर और वफादार स्वभाव के लिए जानी जाती है. यह नस्ल 19वीं सदी में मार्जोरिबैंक्स द्वारा ट्वीड वाटर स्पैनियल और अन्य ब्रिटिश नस्लों को क्रॉस करके विकसित की गई थी. गोल्डन रिट्रीवर परिवार के प्रति समर्पित, बुद्धिमान, बच्चों से प्रेम करने वाली और स्नेह की भूखी होती है. शायद यही वजह थी कि झामरी भी सबके दिलों में बस गई.
आज झामरी नहीं है, लेकिन उसकी यादें हैं मंदिर के सामने पड़ी उसकी शांत देह, उसकी झुकी हुई आंखें, दूध के लिए हिलती पूंछ और बिना बोले सब कुछ सह जाने वाला स्वभाव.
अलविदा झामरी.
तू लावारिस थी, लेकिन तेरी विदाई ने साबित कर दिया..कि प्यार और करुणा के लिए किसी पहचान की ज़रूरत नहीं होती.

8 thoughts on “अलविदा झामरी

  1. भावनाएं शब्दों की मोहताज नहीं होती। क्योंकि वह समान रूप से सभी में होती है बहुत ही शानदार लेख

    1. आपकी टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती है, जब आपने शानदार बोल दिया तो बस वह शानदार हो गया. इसी प्रकार आपका स्नेह बना रहे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *