खुद से खुद की जंग

शैफाली सिन्हा, प्रसिद्ध लेखिका, नवी मुंबई

तुम्हारा जाना
मुझे जीना सिखा गया,
जो कभी सहारे में था
वही सहारा छिन गया।

आदतें बिगाड़ी थीं तुमने ही,
मैं सोचती थी
और सब हो जाता था,
ज़िंदगी के कितने साल
बस इसी लाड़-प्यार में
खामोशी से बीत जाता था।

एक दिन तुम चले गए,
और जीवन
अचानक
अकेला सा हो गया।

अब वही आदतें
दिल को चुभने लगीं,
उनसे बाहर आना
कितना कठिन था
ये तब समझ आया।

कोई और
तुम जैसा लगा ही नहीं,
हर चेहरा
अधूरा सा दिखा।

फिर शुरू हुई
ज़िंदगी की असली जंग,
और मैंने वो सब सीख लिया
जो तुमने कभी नहीं सिखाया।

एक बात समझ में आई
अपनी ज़िंदगी में
सब कुछ करना सीखना पड़ता है,
वरना
अपना अस्तित्व
धीरे-धीरे
मिटने लगता है।

यादें आज भी आती हैं,
मगर अब उदासी नहीं देतीं,
मैं खुद से जंग लड़ रही हूँ
और मुस्कुराकर
तुम्हें देख लेती हूँ।

देखो,
मैं कितना कुछ सीख गई हूँ,
अब मैं
समझदार हो गई हूँ
खुद से
खुद की जंग
जीत रही हूँ।

12 thoughts on “खुद से खुद की जंग

    1. खुद से जंग जीतना है आत्मनिर्भर बन अपना और के लिए प्रेरणा बन जाओगी

  1. Bahut hi sundar jindgi ki sachai ka bisrti kavita me kiya
    Aise hi likhti rahe shefali sinha
    Very nice meaning marmahat karne wali bahut sa dhanyawad tumko

    1. खुद से जंग जीतना है आत्मनिर्भर बन अपना और के लिए प्रेरणा बन जाओगी

    2. Bahut sunder shabdon ki kriti. Anubhav se bada koi shikshak hi nahi hai. Anubhav hamen sab kuchh sikha deti hai. Bas ham bhi taiyar rahen seekhne ko. Warna shikayaten hi karte rah jayenge ham .

  2. बहुत सुंदर एक मिसाल बनोगी और लोगों के लिए प्रेरणा बन जाओगी

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