भरोसे की जिंदगी

पूनम सिंह, मेरठ (उत्तरप्रदेश)

पहली बात तो यह कि भरोसा यह शब्द अपने आप में न जाने कितने रूपों को समेटे हुए है।
जैसे कि
अपने आप पर भरोसा…दूसरों पर भरोसा…जिंदगी पर भरोसा… और अंत में ईश्वर पर भरोसा

ये सभी एक चेन की तरह एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिनके सहारे जिंदगी रूपी नाव आगे बढ़ती है।
इस संसार रूपी समुद्र में कदम-कदम पर सुख-दुख की लहरें उठती-गिरती रहती हैं। इन्हें पार करने के लिए स्वयं पर भरोसा और कभी-कभी दूसरों के सहारे पर भरोसा करना ही पड़ता है।

जिंदगी आपसी भरोसे पर ही चलती है। हम सभी को कभी न कभी, कहीं न कहीं किसी का सहारा लेना ही पड़ता है। उदाहरण के तौर पर. मान लीजिए, यदि मैं या आप में से कोई किसी गहरे गड्ढे में गिर जाए और लाख कोशिशों के बाद भी खुद के बल पर बाहर न निकल पाए, तो ऐसे मुश्किल हालात में यदि कोई व्यक्ति चाहे वह अनजान ही क्यों न हो, हमारी मदद करना चाहे, तो हमारे पास उस पर भरोसा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता।

उस समय वह व्यक्ति हमें ईश्वर का रूप प्रतीत होता है और हम निस्संकोच उसका हाथ थाम लेते हैं।
हाँ, यह जानते हुए भी कि वह हमारे लिए अनजान है, हम अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा देते हैं। उस क्षण हमारे पास यह सोचने का समय नहीं होता कि वह कैसा इंसान है, कौन है, क्यों मदद कर रहा है आदि।
हमारा लक्ष्य बस एक होता है, किसी भी तरह उस गहरे गड्ढे से बाहर निकलना। केन-येन-प्रकारेण।

और अंत में
ईश्वर पर तो भरोसा है ही, वे जो भी करेंगे, अच्छा ही करेंगे।

मेरे हिसाब से यही है “भरोसे की जिंदगी”।

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