
शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’ प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
नादानियां किये हुए तो अब ज़माने हो गए हैं।
अल्हड़ नहीं रहे अब हम, सयाने हो गए हैं।
मौसमों का भी अब तो कुछ मज़ा नहीं लेते।
शरारतों को भी अब दिल में ही दबाने लगे हैं।
गीतों के बोल कुछ भूलाने से लगे हैं।
मन ही मन कुछ गुनगुनाने से लगे हैं।
हंगामों से भी अब तो दूर ही रहते हैं।
यारों के बिना ज़िंदगी हम बिताने लगे हैं।
खुद को ही बना लेते हैं राज़दार अपना।
टालते हैं मुलाकातें, करने बहाने लगे हैं।
थिरकते नहीं अब पांव खुशी से बारिश में,
भीगने से खुद को हम बचाने लगे हैं।
सबसे छुपाना चाहते थे अपने ज़ख्मों को हम।
पता नहीं खुशियां भी क्यों छुपाने लगे हैं।
जाने के लिए निकले थे घर से हम कहीं और के लिए,
भटक गए हैं राह, कहीं और जाने लगे हैं।
Lajwab
Thank you so much
👋👍👍
बहुत ख़ूब 👌👌
बहुत अच्छी रचना। शिखा जी नादानियां कर लीजिए …. सयानापन का चोला उतार फेंकिये।
Thank you so much
बहुत बढ़िया
Wah …too good
Thanks a lot