कभी-कभी गलतफ़हमी

डॉ. रश्मि, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई

कभी-कभी गलतफ़हमी होती है कि वह प्यार करता है;
शायद जज़्बात में आकर इकरार करता है।

सीने से लिपटाकर कहता है “मैं समझता हूँ तुझे”
फिर क्यों किसी के सामने नासमझी की बात करता है?

जब चाहा प्यार किया, जब चाहा इल्ज़ाम दिया,
फिर मेरे ही सर पर बदतमीजी का सेहरा क्यों बाँध दिया?

कहता है “तुझे निभाना नहीं आता रिश्ता”
तो फिर क्यों फरियादें जार-जार किया करता है?

अपनों के बीच दिल खोलकर गुफ़्तगू तक नहीं होती,
और वह कहता है “तू जवाब बहुत देती!”

ताउम्र बेगार हो जाती है रिश्ते निभाते-निभाते,
फिर हर कोई शिकायत करता है कि “ज़िंदगी बेकार कर ली!”

उम्र बीत गई ये सच जानने में कोई अपना नहीं,
मेरी तो कमर ही टूट गई झूठे रिश्ते ढोते-ढोते।

2 thoughts on “कभी-कभी गलतफ़हमी

  1. बहुत ही सुन्दर तरीके से की गई रिश्ते की अभिव्यक्ति

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *