भीड़

रीता मिश्रा तिवारी , भागलपुर

तर्जनी से तीन बार नाक सहलाकर उसने मन ही मन कहा-
“इतने सारे लोग यहाँ इकट्ठा… जरा देखूँ, बात क्या है?”

गाड़ी का गेट खोलकर वह बाहर निकला और एक बुज़ुर्ग भलमानस से पूछा-
“क्या हो रहा है यहाँ? कोई करतब या एक्सिडेंट हुआ है क्या?”

वह पूछता रहा, पर किसी के पास उसके सवालों का स्पष्ट उत्तर नहीं था।
वह हर किसी की आँखों में जवाब ढूँढता रहा।

कभी उचककर देखने की कोशिश, कभी किसी की बाँह पकड़कर साइड करता हुआ वह आगे बढ़ता जा रहा था कि तभी कुछ मिले-जुले शब्द उसके कानों से टकराए-

“भीख माँगने का नया तरीका अपनाया है बेशरम ने।”
“शायद कोई मजबूरी हो भाई साहब, नहीं तो अपनी इज़्ज़त का तमाशा थोड़े कोई यूँ बनाएगा!”
“हो सकता है इसके साथ कुछ बुरा हुआ हो…!”

सुनकर युवक हतप्रभ रह गया।
माजरा समझने ही वाला था कि उसका फोन बज उठा। न चाहने पर भी लगातार बजती रिंग ने उसे फोन उठाने पर विवश कर दिया।

“कहाँ हो? और कितनी देर? समय निकलता जा रहा है। अधीर हुए जा रहे हैं सब! जल्दी आओ!”

सवालों की बौछार सुनकर उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा-
“माँ… इंतज़ार का फल मीठा होता है। बस कुछ ही समय…”

फोन को जींस की जेब में डालकर वह आगे बढ़ा।

इस बार उसकी आँखें फटकर चौड़ी रह गईं… चेहरा पीला पड़ गया!

तेज़ कदमों से वह आगे बढ़ा, कोट उतारकर उसे ढँक दिया।

घुटनों में मुँह छुपाए वह पीड़िता “नहीं… नहीं…!” की चीख के साथ चेहरा ऊपर उठाती है।

“डरो नहीं…”

आवाज़ सुनते ही उसके दोनों हाथ स्वाभाविक रूप से जुड़ गए और आँखें पथरा गईं।

युवक की आँखों में क्रोध दहक रहा था.
जैसे आग का गोला…
जोर से ताली बजाते हुए वह बोला-“वाह भई वाह! आप तमाशबीनों को क्या ही कहें!
कुछ बचा ही नहीं… बस इतना जान लीजिए कि अगर आपकी बेटी या बहू होती तो क्या ऐसे ही बुत बने खड़े रहते और अनाप-शनाप बकते रहते?
ओह! मैं किससे क्या कह रहा हूँ… जिनकी इंसानियत ही मर गई है!”

उसने कंधों से पकड़कर पीड़िता को उठाया। चारों ओर खून से सनी ज़मीन सूखी पड़ी थी।

एक सप्ताह बाद युवा उसे अस्पताल से घर लेकर आया।

सवाल की उम्मीद में उसने घरवालों की आँखों में झाँका, पर वहाँ उसे केवल सहानुभूति और प्यार मिला।

उसने संतोष का निःश्वास भरा और माँ के कहने पर उसे कमरे में छोड़ आया।

कहते हैं, समय पंख लगाकर उड़ता है।
सही है…
पता ही नहीं चला कब उसने खुद को संभाल लिया, और कब घरवालों के दिलों में बस गई।

लोग तो बोलते हैं… और बोलेंगे ही।
आज सुबह भी दरवाज़े पर उसी दिन की तरह लोग इकठ्ठा थे, जुबान से आग उगलते हुए.

“न जाने कहाँ से मुँह काला कर आई है!”
“और आप लोगों ने इसे सर पर चढ़ा रखा है!”
“किस रिश्ते से रह रही है?”
“मटकती रहती है आपके बेटे संग… मोहल्ला खराब कर रखा है!”
“जरा ख्याल है भी? हमारी बहू-बेटियों पर क्या असर पड़ेगा?”

पिता कुछ कहें, उससे पहले युवक ने इशारे से उन्हें रोक दिया।

“बहुत अच्छे समय पर आए हैं आप लोग… बुलाने की मेहनत से बच गए हम।”

आगे बढ़कर युवक की माँ ने कहा—
“बेटा, माता रानी के चढ़ाए सिंदूर से इसकी माँग भरकर रिश्ते में बाँध दे… और भीड़ का मुँह बंद कर दे।”

माँ के शब्दों से पिता भी प्रसन्न थे।

भीड़ की ओर मुखातिब होकर माँ बोली—
“कल मेरे बेटे-बहू के रिसेप्शन में आप सभी आमंत्रित हैं। कृपया ज़रूर आइएगा।”

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