
महेशप्रसाद शर्मा, प्रसिद्ध लेखक, बरेली (मध्यप्रदेश)
कुम्हार कितने परिश्रम से दिया बनाता है,
उन्हें बेचने बाज़ार में आता है।
लोग कहते हैं, कीमत कम करो, ज़्यादा बता रहे,
उसकी मजबूरी का फ़ायदा उठा रहे।
उसे बेटी को पढ़ाना है,
विवाह करके उसकी ज़िंदगी को आगे बढ़ाना है।
भोजन की व्यवस्था भी इसी में करनी है,
वृद्ध माता-पिता के इलाज में डॉक्टर की मोटी फ़ीस भी भरनी है।
लोग हैं कि मोल-भाव करते हैं,
दिया खरीदने का एहसान उस पर धरते हैं।
उसने रात-दिन एक किया है दिया बनाने में,
मिठाई नहीं है उसकी थाली के किसी खाने में।
बड़े लोग बड़ा खर्च करते हैं त्योहार पर,
व्यापारिक तिकड़म करते हैं कुम्हार पर।
अरे, कुछ तो सोचो
गरीब कुम्हार की आत्मा को तो मत नोंचो।
इसीलिए बड़े लोगों को असाध्य बीमारियाँ होती हैं,
फिर विदेश के अस्पताल जाने की तैयारियाँ होती हैं।
वह कुम्हार धूप में ग्राहक आने की राह तकता है,
दियों के साथ वह भी तो पकता है।
दियों में उसकी आत्मा समा जाती है,
इसी बहाने कुछ रकम आ जाती है।
दीपावली बाद कोई नहीं लेगा दिया,
कोई नहीं देखता, उसने कितना परिश्रम किया।
सुंदर रचना
कुम्हार का दर्द आपकी कलम से पाठकों के मन को छूती रहे ,
मेरी शुभकामनाएँ
बहुत प्रेरणादायक रचना