
महेश प्रसाद शर्मा, लेखक, बरेली (मध्यप्रदेश)
नव अंबर, नव भोर है,
नव-नव, नव आदित्य नया है प्रकाश।
नया अंकुरित बीज भूमि से,
ले जीवन की नई आस।।
आया ऊपर देखा जग को,
हो उमंग मन परम हुलास।
आसपास सुंदर उपवन में,
देते अपनी सरस सुवास।।
मैं शिशु हूँ, पर बढ़ूँगा नित नव,
नित नव वायु-जल लेकर।
नव बिहान शुभ नित नव होगा,
पर्यावरण नया कर दूँगा,
नित नई वृद्धि मैं देकर।।
संरक्षक बन जाना मानव,
कुछ दिन की तो बात है।
मैं सुकुमार और कोमल हूँ,
नरम-नरम मम गात है।।
एक दिन फिर ऐसा आएगा,
बन जाऊँगा वृक्ष महान।
मेरे तन के नीचे छाया,
पाएगा यह सकल जहान।।
ऑक्सीजन भंडार अपरिमित,
नित नव नया लुटाऊँगा।
नित नव नया प्रेम फिर-फिर मैं,
नित्य नया मैं पाऊँगा।।
नई झोंपड़ी बनने हेतु,
मैं अपनी शाखाएँ दूँगा।
किसी गरीब के घर में रहकर,
जीवन में सुख-राहत लूँगा।।
किसी गाय-बकरी की खूंटी,
और कहीं पर मैं मल्लखंभ।
कहीं विवाह की तोरणद्वार में,
मुझसे ही होगा आरंभ।।
मुझे बचाओ, मुझे बढ़ाओ,
हे मानव, यह विनती मेरी।
है निःस्वार्थ मेरा यह जीवन,
बाकी फिर तो इच्छा तेरी।।
