
कृष्णा तिवारी कृति, लेखिका, बिरलाग्राम नागदा जं.
लगते हैं प्रश्नचिह्न
निस्वार्थ प्रेम पर
कभी-कभी।
आँखों का
एक हीरा, एक तारा —
चमक दोनों में है,
मगर चमक-चमक में
फर्क है दिखावे का।
दृष्टिगत दोनों ही हैं,
मगर दृष्टि-दृष्टि में
फर्क है ममता का।
तारा ऊँचाई पर,
हीरा गहराई में,
दुर्लभ दोनों ही हैं,
मगर फर्क है
दिल से दूरी का।
किसी को मिलती है
विरासत में सूर्य से रोशनी,
चाँद का हाथ सर पर,
तो कोई पीता है कूपों में
अंधेरा अमावस-सा।
परख गुमनाम परतों में
नहीं होता वह,
कवि की थोथी कल्पनाओं में,
जिसे तोड़ने के लिए
लंबे हाथों की जरूरत हो।
इसीलिए लगते हैं
कभी-कभी
ममता पर भी प्रश्नचिह्न…