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प्रश्नचिह्न

कभी-कभी निस्वार्थ प्रेम पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं। आँखों में चमक तो होती है—कभी हीरे की, कभी तारे की—पर दोनों की चमक में अंतर होता है, दिखावे का। दोनों दृष्टिगत होते हुए भी दृष्टि की गहराई में फर्क ममता का होता है। तारा ऊँचाई पर है, हीरा गहराई में; दोनों ही दुर्लभ हैं, पर दिल की दूरी उन्हें अलग करती है। किसी को विरासत में सूर्य की रोशनी और चाँद का आशीर्वाद मिलता है, तो कोई अंधेरी अमावस के कुओं से अंधेरा पीता है। सच्ची परख गुमनाम परतों में छिपी होती है, कवि की कल्पनाओं में नहीं—उसे पहचानने के लिए लंबे हाथ नहीं, गहराई चाहिए। शायद इसी कारण, कभी-कभी ममता पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है।

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