
सपना चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका, कहलगांव, भागलपुर बिहार
अरसे बाद अपनी
यादों से भरी
डायरी को खोलने पर
एक अजीब-सी गंध ने
मुझे जकड़ लिया।
मेरे चारों ओर
धूल ही धूल उड़ रही थी।
कहाँ-कहाँ से हटा पाती,
उसे तो वहीं रहना था।
जिधर भी नज़रें जातीं,
उधर-उधर ही।
परेशान-सी होकर
भाग जाने को जी चाहा
अपने अतीत से मुँह मोड़कर
हमेशा के लिए।
क्योंकि मेरी साँसें
उखड़ने लगी थीं,
जैसे किसी खंडहरनुमा घर के
दरवाज़े खोलने पर
जो गंध घेर लेती है —
कुछ-कुछ वैसा ही
मुझे महसूस होता रहा।
मिले-जुले अतीत में भी
एक कहानी होती ही है,
जो चुभती रहती है।
अतीत भी वर्तमान में शामिल रहता है।
शातिर यादें, अभिव्यक्ति क़माल
बहुत ख़ूब 👌👌