
ज्योति सोनी, प्रसिद्ध लेखिका, अलवर
कुछ नज़ारे ऐसे होते हैं,
ज़िंदगी समेटे हुए।
फिर आते नहीं वापस,
मगर दिखते नहीं जाते हुए।
कुछ नज़ारे प्रेम-रस के बादल,
कर रहे मन-भँवर को पागल।
यादों के अंबर के पाखी,
लौटा लाओ दिन वो रातें।
कुछ नज़ारे आँखों का काजल,
मन में खिलते फूलों का डोला।
खुशबू रंग-बिरंगी फैलाए,
कुछ नज़ारे जब याद आ जाएँ,
जीवनभर को महकाते रहते।
एक मुस्कान-सी लाएँ,
अपना संग है कोई प्यारा,
चलो ज़िंदगी जी के दिखाएँ।
कुछ नज़ारे पाँव की पायल,
जब छनके तब लहराता आँचल।
जीवन को समेट के लाएँ,
कुछ नज़ारे मन को भाएँ।
