
सरिता सिंह “ नेपाली “ बेतिया पश्चिम चंपारण बिहार
लिखने को कुछ भी नहीं था, परंतु शब्दों का जखीरा मस्तिष्क में कुलबुला रहा था।
एक ओर मोह मेरी मुट्ठी में क़ैद था, तो दूसरी ओर प्रेम आज़ाद पंछी की तरह उड़ने को आतुर।
विचित्र है यह बात—प्रेम ने ही तो मोह को जन्म दिया था, फिर उसी मोह की क़ैद उसे क्यों असह्य हो गई थी?
मोह ने अपने भीतर संदेह के जीवाणु पाल रखे थे,
और प्रेम की आत्मा को यह रत्ती भर भी स्वीकार न था।
प्रेम बसंत का प्रथम संगीत है—
नव कोपलों की मुस्कान, ओस की पहली बूँद,
धड़कते समंदर की मचलती धाराएँ।
और मोह?
वह पतझड़ का शोकगीत है—
सूखी रेत, जो मुट्ठी में थामते ही
फिसल जाने को बेचैन रहती है।
इन्हीं दोनों की कश्मकश ने
मौसमों का हर रंग फीका कर दिया था।
मोह ने मन को भय से भर दिया—
“अब क्या होगा?”
और तभी मैंने प्रेम को मुक्त कर दिया—
समंदर की लहरों की मादकता के लिए,
बसंत की तरुणाई की हरियाली के लिए,
तृण पर ठहरती ओस की मासूम अंगड़ाई के लिए,
पवन की मस्त झंकारों के लिए,
प्रेमिकाओं के केशों में सजी वेणियों के लिए,
और उन सभी प्रेमियों के लिए,
जो केवल प्रेम करना जानते हैं।
हाँ, उन अजन्मी मासूम रूहों के लिए भी,
जिन्हें इस जग से कुछ नहीं चाहिए—
सिवाय प्रेम के।
और तब समझ आया—
मोह प्रेम की परछाई है।
भले ही वह बोझिल लगे,
पर कहीं न कहीं वही प्रेम को ऊर्जा भी देता है।

मोह एवं प्रेम का ऐसा सुन्दर वर्णन पहली बार देखा।
शब्दों से सरिता जी ने गढ़ी,संवेदना की अमिट लकीर,
मोह और प्रेम के बीच दिखा दिया जीवन का अधीर,
बिंबों में बसंत की छवि,पतझड़ की करुण पुकार,
आपकी लेखनी में झलकता है सृजन अपार
बेहद खूबसूरत शब्दों से से मोह और प्रेम की व्याख्या की है जो आपकी विद्वता का परिचय देती हैं।🙏🙏
अति सुन्दर शब्दों का बुनना