स्त्री

स्त्री, हर ताले की चाबी अपने पास रखती है। घर के हर कोने में, हर रिश्ते में, वह सबकी ज़रूरतों और सपनों के ताले बड़ी आसानी से खोल लेती है। लेकिन विडंबना यह है कि उसके पास कभी अपनी ही मनमर्ज़ी की चाबी नहीं होती। दूसरों के लिए खुली हुई दुनिया के बीच, उसके अपने इच्छाओं का द्वार अकसर बंद रह जाता है।

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मोह और प्रेम

लिखने को कुछ नहीं था, परंतु शब्द मस्तिष्क में ऐसे कुलबुला रहे थे मानो बाहर आने को व्याकुल हों।
मन के दो छोर सामने थे—एक ओर मोह, जो मुट्ठी में क़ैद था, और दूसरी ओर प्रेम, जो आज़ाद पंछी की तरह उड़ना चाहता था। यह विडंबना ही थी कि प्रेम ने ही मोह को जन्म दिया, फिर भी उसी की कैद प्रेम को असह्य हो गई।मोह के भीतर संदेह के जीवाणु पलते रहे, जिन्हें प्रेम ने कभी स्वीकार नहीं किया।प्रेम बसंत की शुरुआत था—नवजीवन का उत्सव, जबकि मोह पतझड़ का सूना संदेश।
प्रेम उमड़ते समंदर की लहर था, मोह रेत का वह कण, जो मुट्ठी में थमता ही नहीं और फिसल जाने को आतुर रहता है।

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घर…

मैंने अपना घर किसी ईंट-पत्थर की दीवारों पर नहीं, बल्कि एक मधुर, दर्दभरी और सुरीली तान पर बनाया है। यह महज़ चार दीवारें और एक छत नहीं, बल्कि ऐसा स्थान है जहाँ भोर से लेकर संध्या और संध्या से रात तक संगीत बहता है। यहाँ संवाद की स्वतंत्रता है, त्याग और समर्पण का अहसास है, और रिश्तों के मौन बंधन भी। इस घर में पंछियों की चहचहाहट, पेड़ों की हरियाली, तितलियों के रंग और मिट्टी की गंध बसी है। यहाँ प्राणवायु संचार करती है और नादब्रह्म विचरता है। यह रंगों और सुगंधों से भरा, मिट्टी और खुले आसमान से जुड़ा एक निरामय संसार है।

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इल्तज़ा

पंख थक गए हैं, तो एक बार मिलने आ जाओ। मैं भी कभी स्वच्छंद पंछी जैसा था। आंसुओं के समंदर को मत रोको, उन्हें वैसे ही बहने दो जैसे सावन की झड़ी बहती है। लिखे हुए खतों की सौगात शायद कोई लौटाए, लेकिन वही कमाल का जिगर ए यार होगा, जैसा मैं हूं। किताबों पर धूल जमने से कहानी नहीं बदलती, और मैं भी कभी पुरानी किताबों को पढ़ने जैसा हूं। आज तक कौन गया है इस मिट्टी के आगे? मैं भी उस धूल के मुख़्तसर ज़र्रे जैसा हूं। जानते हैं, लौटते वक्त कुछ भी साथ में नहीं ले जा सकते, फिर भी बचा लो यारों, थोड़ा सरण और कफ़न जैसा…

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